हरियाणा के रोहतक जिले के एक छोटे से गाँव में रहने वाले रामेश्वर सिंह की आँखों में आज एक अलग ही चमक है। उनकी बेटी प्रिया का जन्म हुए अभी कुछ ही महीने हुए हैं। पहले बेटी के जन्म पर जो चिंता का बादल छा जाता था, वह अब खुशी की किरणों में बदल गया है। वजह है हरियाणा सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना जो बेटियों के भविष्य को संवारने का वादा करती है।
खेती-किसानी करने वाले परिवारों में आर्थिक स्थिति हमेशा से अनिश्चित रही है। मौसम की मार, फसल के दाम में उतार-चढ़ाव, और बढ़ते खर्च - ये सब किसानों को परेशान करते हैं। ऐसे में बेटी की शिक्षा, शादी और भविष्य को लेकर चिंता स्वाभाविक है।
करनाल के किसान सुरेंद्र पाल याद करते हैं कि उनकी बड़ी बेटी के जन्म के समय परिवार में खुशी कम और चिंता ज्यादा थी। दहेज की प्रथा, शादी का खर्च, और समाज का दबाव - ये सब मन में डर पैदा करते थे। खेती से जो भी कमाई होती, उसमें से बचत करना मुश्किल था।
हरियाणा में लंबे समय तक लिंगानुपात की समस्या रही है। बेटियों को बोझ समझने की सोच ने समाज को बहुत नुकसान पहुँचाया। कई परिवारों में बेटी के जन्म को लेकर नकारात्मक रवैया रहा। इस सामाजिक बुराई को दूर करने के लिए सरकार ने कई प्रयास किए।
Lado Lakshmi Yojana की घोषणा ने किसान परिवारों में नई आशा जगाई है। यह योजना बेटियों के जन्म से लेकर उनकी शादी तक आर्थिक सहायता प्रदान करती है। कुल दो लाख रुपये की राशि विभिन्न चरणों में दी जाती है, जो एक किसान परिवार के लिए बड़ी मदद है।
झज्जर के किसान जगदीश चौधरी बताते हैं कि जब उनकी पत्नी गर्भवती थीं, तो पूरा परिवार बेटी के जन्म की प्रार्थना कर रहा था। पहले यह सोच असंभव थी। लेकिन सरकारी योजना ने मानसिकता बदल दी। अब बेटी को वरदान माना जाता है, बोझ नहीं।
योजना की सबसे बड़ी खासियत है इसकी चरणबद्ध व्यवस्था। जन्म पर, पांचवीं कक्षा में, नौवीं कक्षा में, बारहवीं कक्षा में, और इक्कीस वर्ष की उम्र में - हर महत्वपूर्ण पड़ाव पर आर्थिक सहायता मिलती है। यह सुनिश्चित करता है कि बेटी की शिक्षा और विकास निरंतर होता रहे।
खेती में मेहनत तो बहुत होती है लेकिन आय सीमित रहती है। सोनीपत के किसान राजबीर सिंह कहते हैं कि धान और गेहूं की खेती से जो कमाई होती है, उसमें परिवार का खर्च निकालना ही मुश्किल है। बच्चों की पढ़ाई का खर्च अलग। ऐसे में बेटी के भविष्य के लिए बचत करना लगभग असंभव था।
अब Lado Lakshmi Yojana के तहत मिलने वाली राशि से बेटियों की शिक्षा में निवेश हो सकता है। अच्छे स्कूल में दाखिला, किताबें, यूनिफॉर्म, और ट्यूशन - सब कुछ संभव है। पानीपत के किसान रामकरण की बेटी अब शहर के एक अच्छे स्कूल में पढ़ती है। वे कहते हैं कि सरकारी मदद के बिना यह संभव नहीं था।
कैथल जिले के एक छोटे किसान परिवार में दो बेटियाँ हैं। पिता महावीर प्रसाद बताते हैं कि दोनों बेटियों के लिए योजना का लाभ मिल रहा है। यह राशि उन्होंने बेटियों की शिक्षा के लिए अलग रख दी है। अब उन्हें विश्वास है कि उनकी बेटियाँ अच्छी पढ़ाई करके आत्मनिर्भर बनेंगी।
योजना का सबसे बड़ा प्रभाव बालिका शिक्षा पर पड़ा है। पहले ग्रामीण इलाकों में बेटियों को स्कूल भेजने में हिचकिचाहट होती थी। आर्थिक तंगी और पुरानी सोच - दोनों बाधाएँ थीं। अब स्थिति बदल रही है।
अंबाला के गाँवों में लड़कियों का नामांकन बढ़ा है। स्कूलों में बालिकाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। शिक्षिका सुनीता शर्मा बताती हैं कि पहले आठवीं-नौवीं के बाद लड़कियाँ स्कूल छोड़ देती थीं। अब Lado Lakshmi Yojana की वजह से माता-पिता बेटियों को आगे पढ़ाने के लिए प्रोत्साहित हैं।
फतेहाबाद के किसान संजय कुमार की बेटी अब कॉलेज में है। वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही है। संजय कहते हैं कि पहले यह सपना था, अब हकीकत है। सरकारी सहायता ने उनका हौसला बढ़ाया। अब वे अपनी बेटी को डॉक्टर या इंजीनियर बनते देखना चाहते हैं।
योजना का असर सिर्फ आर्थिक नहीं है, बल्कि सामाजिक भी है। हरियाणा में जहाँ कभी बेटियों को अवांछित माना जाता था, वहाँ अब स्थिति बदल रही है। लिंगानुपात में सुधार के संकेत मिल रहे हैं।
हिसार के एक गाँव में सरपंच रामफल सिंह बताते हैं कि पहले गाँव में बेटी के जन्म पर घर में मातम जैसा माहौल होता था। अब खुशियाँ मनाई जाती हैं। लोगों की सोच बदली है। बेटियों को अब सम्मान से देखा जाता है।
गुड़गांव के ग्रामीण इलाके में महिला स्वयं सहायता समूह की सदस्य कमला देवी कहती हैं कि योजना ने बेटियों की स्थिति मजबूत की है। अब परिवार में बेटी का मान बढ़ा है। उनकी राय ली जाती है और उन्हें निर्णय लेने का अधिकार मिलता है।
Lado Lakshmi Yojana सिर्फ आर्थिक सहायता नहीं है, यह बेटियों को आत्मनिर्भर बनाने का माध्यम है। जब बेटियाँ शिक्षित होती हैं, तो वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हैं। उन्हें किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
रेवाड़ी की रश्मि, जिसे इस योजना का लाभ मिला था, आज एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका हैं। वह कहती हैं कि अगर उनके माता-पिता को आर्थिक मदद न मिली होती, तो शायद वे भी आठवीं-दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़ देतीं। सरकारी योजना ने उनका जीवन बदल दिया।
मेवात के किसान इकबाल हुसैन की तीन बेटियाँ हैं। वे सभी पढ़-लिखकर अच्छे पदों पर हैं। इकबाल गर्व से कहते हैं कि बेटियाँ बेटों से कम नहीं। उन्होंने परिवार का नाम रोशन किया है। और इसमें सरकारी योजना का बहुत योगदान रहा।
हालांकि योजना बहुत अच्छी है, लेकिन कुछ चुनौतियाँ भी हैं। ग्रामीण इलाकों में जागरूकता की कमी है। कई किसान परिवार अभी भी योजना के बारे में नहीं जानते। दूरदराज के गाँवों तक जानकारी पहुँचाना जरूरी है।
पलवल जिले में सामाजिक कार्यकर्ता रीता शर्मा कहती हैं कि उन्होंने गाँव-गाँव जाकर महिलाओं को योजना के बारे में बताया। कई परिवारों ने पंजीकरण कराया। लेकिन अभी भी बहुत से लोग इससे वंचित हैं। सरकार को जागरूकता अभियान तेज करना चाहिए।
दस्तावेजों की जटिलता भी एक समस्या है। निरक्षर किसानों के लिए फॉर्म भरना और कागजात जुटाना मुश्किल होता है। इसके लिए स्थानीय स्तर पर मदद केंद्र होने चाहिए। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और ग्राम पंचायत इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
Lado Lakshmi Yojana के लिए ऑनलाइन आवेदन की सुविधा भी है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की कमी और डिजिटल साक्षरता की कमी बाधा है। कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) इसमें मदद कर रहे हैं।
यमुनानगर के CSC संचालक विकास कुमार बताते हैं कि रोज दस-पंद्रह किसान परिवार योजना के लिए आवेदन करने आते हैं। वे उन्हें पूरी प्रक्रिया समझाते हैं और फॉर्म भरने में मदद करते हैं। यह सेवा निशुल्क होनी चाहिए ताकि गरीब परिवारों पर बोझ न पड़े।
मोबाइल ऐप के जरिए भी आवेदन किया जा सकता है। युवा पीढ़ी अपने माता-पिता की मदद कर रही है। भिवानी के राहुल ने अपनी छोटी बहन के लिए खुद ऑनलाइन आवेदन किया। वह कहता है कि प्रक्रिया सरल है, बस थोड़ी समझ की जरूरत है।
इस योजना का दूरगामी प्रभाव होगा। जब बेटियाँ शिक्षित और आत्मनिर्भर होंगी, तो पूरा समाज मजबूत होगा। महिला सशक्तिकरण से परिवार और राष्ट्र दोनों का विकास होता है।
कुरुक्षेत्र की डॉ. अनीता मलिक, जो महिला एवं बाल विकास विभाग में काम करती हैं, कहती हैं कि यह योजना भविष्य में निवेश है। आज जो बेटियाँ इसका लाभ ले रही हैं, कल वे डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षिका या प्रशासनिक अधिकारी बनेंगी। वे समाज को नई दिशा देंगी।
हरियाणा के किसान परिवारों में अब बेटी के जन्म पर खुशी का माहौल होता है। लोग समझ रहे हैं कि बेटियाँ बोझ नहीं बल्कि परिवार की ताकत हैं। यह मानसिकता परिवर्तन ही सबसे बड़ी उपलब्धि है।
खेत की मेहनत से जो कमाई होती है, वह सीमित है। लेकिन बेटी का भविष्य असीमित संभावनाओं से भरा है। सरकारी योजना ने इन दोनों को जोड़ दिया है। किसान परिवार अब निश्चिंत होकर अपनी बेटियों का भविष्य संवार सकते हैं।
रोहतक के किसान रामेश्वर, जिनका जिक्र शुरुआत में हुआ था, कहते हैं कि उनकी बेटी प्रिया का भविष्य उज्ज्वल है। सरकारी मदद से वे उसे अच्छी शिक्षा देंगे। वह जो बनना चाहेगी, बनेगी। उस पर कोई दबाव नहीं होगा। यही तो असली आजादी है।
हरियाणा की धरती, जो कभी बेटियों के लिए कठोर मानी जाती थी, अब उनके लिए अवसरों की भूमि बन रही है। यह बदलाव रातोंरात नहीं आया, लेकिन सही दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं। और इसमें सरकारी योजनाओं का बहुत बड़ा योगदान है। बेटियों का सम्मान और उनका सशक्तिकरण ही समाज की सच्ची प्रगति है।