भारत कृषि प्रधान देश है और गेहूं इसकी सबसे महत्वपूर्ण फसलों में से एक है। हर साल लाखों किसान अपनी आजीविका के लिए गेहूं उत्पादन पर निर्भर रहते हैं। वहीं, गेहूं वायदा (Wheat Futures) बाजार किसानों और व्यापारियों दोनों के लिए अहम भूमिका निभाता है। यह न केवल कीमतों का अनुमान लगाने में मदद करता है बल्कि जोखिम प्रबंधन का साधन भी है। लेकिन हाल के वर्षों में बढ़ती गर्मी और बदलती व्यापार नीतियों ने इस बाजार को गंभीर संकट की स्थिति में पहुँचा दिया है।
गेहूं वायदा का महत्व
वायदा बाजार वह जगह है जहाँ निवेशक और व्यापारी भविष्य की तारीख पर तय कीमत पर गेहूं खरीदने या बेचने का सौदा करते हैं। सामान्य परिस्थितियों में यह व्यवस्था किसानों को बेहतर दाम दिलाने और उपभोक्ताओं को स्थिर कीमत पर अनाज उपलब्ध कराने में मदद करती है। किंतु जब जलवायु परिवर्तन और व्यापार नीतियाँ असंतुलित हो जाती हैं, तो यह बाजार अनिश्चितता का शिकार हो जाता है।
गर्मी का असर और उत्पादन में गिरावट
पिछले कुछ वर्षों में भारत में तापमान लगातार बढ़ रहा है। मार्च और अप्रैल में औसत से 4-6 डिग्री अधिक गर्मी दर्ज की गई। इस असामान्य गर्मी का सीधा असर गेहूं की फसल पर पड़ा। दाने समय से पहले पक गए, सिकुड़न बढ़ गई और कुल उत्पादन घट गया।
इस उत्पादन संकट के चलते किसानों को अधिक लागत उठानी पड़ी। अतिरिक्त सिंचाई, खाद और कीटनाशकों की जरूरत ने खेती महंगी कर दी। वहीं, घटिया गुणवत्ता वाले गेहूं की वजह से बाजार में खरीदारों की दिलचस्पी कम हुई। इन सबका सीधा असर वायदा कीमतों की अस्थिरता पर पड़ा।
व्यापार नीतियों की जटिलता
भारत सरकार घरेलू उपभोक्ताओं को सस्ता गेहूं उपलब्ध कराने के लिए कई बार निर्यात पर प्रतिबंध लगाती है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, खासकर रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद, गेहूं की मांग काफी बढ़ी है। इस वजह से भारत को नीति निर्धारण में संतुलन बनाना मुश्किल हो गया है।
अगर निर्यात रोका जाता है तो किसानों और व्यापारियों को नुकसान होता है क्योंकि उन्हें वैश्विक स्तर पर ऊँचे दाम नहीं मिल पाते। वहीं, अगर निर्यात खोला जाता है तो घरेलू बाजार में कीमतें बढ़ जाती हैं जिससे आम जनता प्रभावित होती है। यही विरोधाभास वायदा बाजार को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है।
खाद्य सुरक्षा और भंडारण की समस्या
भारतीय खाद्य निगम (FCI) और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को स्थिर भंडार की आवश्यकता होती है ताकि गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों तक सस्ता अनाज पहुँचाया जा सके। लेकिन जब उत्पादन घटता है तो भंडार पर दबाव बढ़ जाता है। सरकार को या तो आयात का सहारा लेना पड़ता है या बाजार में सीधे हस्तक्षेप करना पड़ता है। इन दोनों ही परिस्थितियों का असर वायदा व्यापार पर नकारात्मक रूप से पड़ता है।
निवेशकों और व्यापारियों पर असर
गेहूं वायदा (Wheat Futures) का उद्देश्य जोखिम को कम करना होता है, लेकिन जब तापमान और व्यापार नीतियाँ लगातार अस्थिर रहती हैं तो यह बाजार निवेशकों के लिए जोखिमपूर्ण बन जाता है। दामों में अचानक तेजी या गिरावट छोटे व्यापारियों और निवेशकों को भारी नुकसान पहुँचा सकती है। कई बार सट्टेबाजी भी इस अस्थिरता को और बढ़ा देती है। नतीजतन, निवेशकों का भरोसा कमजोर होता है और वे इस बाजार से दूरी बनाने लगते हैं।
संभावित समाधान
इस संकट से निपटने के लिए कई व्यावहारिक कदम उठाए जा सकते हैं:
1. आधुनिक कृषि तकनीक: तापमान-सहनशील बीजों का विकास और ड्रिप इरिगेशन जैसी आधुनिक सिंचाई प्रणालियाँ किसानों को उत्पादन में स्थिरता दिला सकती हैं।
2. पारदर्शी नीतियाँ: सरकार को निर्यात-आयात नीतियों में पारदर्शिता और स्थिरता लानी चाहिए ताकि बाजार में भरोसा कायम रहे।
3. भंडारण क्षमता में वृद्धि: यदि अनाज का भंडारण सही ढंग से किया जाए तो संकट की स्थिति में भी घरेलू जरूरतें पूरी की जा सकती हैं।
4. वैश्विक सहयोग: अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक साझेदारियों को मजबूत कर भारत अपनी स्थिति को स्थिर बना सकता है।
निष्कर्ष
भारत में गर्मी और व्यापार नीतियों की अस्थिरता ने गेहूं वायदा बाजार को गंभीर संकट में डाल दिया है। जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पादन घट रहा है, जबकि नीतिगत फैसले बाजार की स्थिरता को और चुनौती दे रहे हैं। यदि समय रहते टिकाऊ कृषि, तकनीकी निवेश और नीतिगत सुधारों पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गहर सकता है।
गेहूं वायदा बाजार की स्थिरता केवल व्यापारियों और निवेशकों के लिए ही नहीं, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा और किसानों की आर्थिक स्थिरता के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है।