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मृदा (Type of Soil) प्रकार, महत्व व संरक्षण

11 Aug, 2025 02:29 PM

मृदा यानी मिट्टी, हमारे जीवन का आधार है। यह न सिर्फ पेड़-पौधों को पोषण देती है, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में भी अहम भूमिका निभाती है।

FasalKranti
Emren, समाचार, [11 Aug, 2025 02:29 PM]
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मृदा यानी मिट्टी, हमारे जीवन का आधार है। यह न सिर्फ पेड़-पौधों को पोषण देती है, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में भी अहम भूमिका निभाती है। क्या आप जानते हैं कि भारत में अलग-अलग प्रकार की मृदा पाई जाती है और हर एक की अपनी विशेषताएं होती हैं? अगर आप किसान हैं, गार्डनिंग करते हैं या फिर पर्यावरण में रुचि रखते हैं, तो मृदा के बारे में जानना आपके लिए बेहद जरूरी है।

इस लेख में हम मृदा क्या है, इसके प्रकार, महत्व और संरक्षण के तरीकों के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे।

मृदा क्या है? (What is Soil?)

हमारे पैरों के नीचे फैली मिट्टी सिर्फ गंदगी नहीं, बल्कि जीवित परत है जो पेड़-पौधों और हम सभी का नींव है। यह चट्टानों के टूटने और प्रकृति के लाखों वर्षों के संवारने से बनती है। जब हम मिट्टी को अपने हाथ में लेते हैं, तो वास्तव में हम चार जड़ी-बुटियों मूल तत्वों का मिला-जुला पकड़ रखे होते हैं - चट्टानों के धनुषाकार कण, सड़े-गले पत्ते-जीवों का पोषक तत्व, हवा और पानी। प्रकृति की यह अनोखी प्रयोगशाला जिसे 'पेडोजेनेसिस' कहते हैं,       विभिन्न स्थानों पर विभिन्न प्रकार की मिट्टी बनाती है। कोई पहाड़ी ढलान पर, कोई नदी के किनारे तो कोई जंगल की छाया। हर मिट्टी की कुछ अपनी कहानी है - कुछ रेतीली, कुछ चिकनी, तो कुछ काली और उपजाऊ। यह मिट्टी हमारे खेतों की शान है, जिसमें अनाज के अलावा हमारी संस्कृति की जड़ें भी बसी हैं। जब हम मिट्टी को समझेंगे, तभी उसकी देखभाल कर पाएंगे।

मृदा के मुख्य घटक:

  1. खनिज (45%) – रेत, गाद, मिट्टी
  2. जल (25%) – पौधों के लिए आवश्यक
  3. वायु (25%) – जड़ों को ऑक्सीजन देता है
  4. जैविक पदार्थ (5%) – ह्यूमस, सूक्ष्मजीव

भारत में मिट्टी के प्रकार: एक वैज्ञानिक विश्लेषण

प्राचीन भारतीय ग्रंथों में मिट्टी को मूल रूप से दो श्रेणियों - उर्वरा (उपजाऊ भूमि) और ऊसर (बंजर भूमि) में वर्गीकृत किया गया था। आधुनिक युग में मिट्टी वर्गीकरण का श्रेय रूसी वैज्ञानिक वासिली डोकुचेव को जाता है, जिन्होंने सर्वप्रथम मिट्टी को वैज्ञानिक आधार पर वर्गीकृत किया।

भारतीय संदर्भ में, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने देश की मिट्टियों को आठ प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया है:

  1. जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil)
  2. काली मिट्टी/रेगुर (Black Soil/Regur)
  3. लाल एवं पीली मिट्टी (Red and Yellow Soil)
  4. लैटेराइट मिट्टी (Laterite Soil)
  5. पर्वतीय मिट्टी (Forest/Mountain Soil)
  6. शुष्क मरुस्थलीय मिट्टी (Arid/Desert Soil)
  7. लवणीय एवं क्षारीय मिट्टी (Saline and Alkaline Soil)
  8. पीट एवं दलदली मिट्टी (Peaty and Marshy Soil)

इन प्रमुख श्रेणियों के अतिरिक्त भारत में कुछ विशिष्ट क्षेत्रीय मिट्टी प्रकार भी पाए जाते हैं, जैसे कश्मीर घाटी की करेवा मिट्टी, उप-पर्वतीय क्षेत्रों की मिट्टी, हिमनदों द्वारा निर्मित मिट्टी, तथा धूसर एवं भूरी मिट्टी। ये सभी मुख्य मिट्टी प्रकारों के उप-वर्ग माने जाते हैं, जिनकी अपनी विशिष्ट भौगोलिक एवं कृषि संबंधी विशेषताएँ होती हैं।

भारत में मिट्टी के प्रकार जलोढ़ मिट्टी

  • जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil)भारत की सबसे महत्वपूर्ण और व्यापक रूप से पाई जाने वाली मिट्टी है,
  • जो मुख्य रूप से नदियों द्वारा बहाकर लाई गई गाद और तलछट से बनती है। यह मिट्टी उत्तरी भारत के विशाल मैदानों जैसे गंगा-यमुना का मैदान, ब्रह्मपुत्र घाटी और तटीय डेल्टाई क्षेत्रों में पाई जाती है।
  • जलोढ़ मिट्टी अपने उच्च उर्वरता स्तर के लिए जानी जाती है, जिसमें पोटाश, फॉस्फोरिक एसिड और चूना प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
  • इसकी बनावट रेतीली से लेकर चिकनी तक हो सकती है, जो इसे विभिन्न प्रकार की फसलों के लिए उपयुक्त बनाती है।
  • भारत की प्रमुख खाद्यान्न फसलें जैसे गेहूं, चावल, गन्ना और दलहन इसी मिट्टी में उगाई जाती हैं। जलोढ़ मिट्टी को पुरानी जलोढ़ (बांगर) और नई जलोढ़ (खादर) में भी वर्गीकृत किया जाता है,
  • जहां खादर मिट्टी अधिक उपजाऊ मानी जाती है। यह मिट्टी भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और देश की खाद्य सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान देती है।

भारत में मिट्टी के प्रकार लाल और पीली मिट्टी

  • भारत में लाल और पीली मिट्टी मुख्य रूप से पठारी और ऊबड़-खाबड़ इलाकों में पाई जाती है,
  • खासकर ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और दक्षिणी राज्यों में। इस मिट्टी का लाल रंग आयरन ऑक्साइड की अधिकता के कारण होता है,
  • जबकि पीला रंग जलयोजित आयरन ऑक्साइड (लिमोनाइट) की वजह से दिखाई देता है। यह मिट्टी आमतौर पर कम उपजाऊ होती है
  • क्योंकि इसमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और जैविक पदार्थों की कमी होती है। हालाँकि, सही प्रबंधन और जैविक खाद के उपयोग से इसमें बाजरा, मूंगफली, अरहर और कपास जैसी फसलें उगाई जा सकती हैं।
  • लाल मिट्टी वाले क्षेत्रों में अक्सर लौह अयस्क (आयरन ओर) पाया जाता है, जिससे यह खनिज संपदा की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
  • इस मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए हरी खाद और फसल चक्रण जैसी तकनीकें कारगर साबित होती हैं।

भारत में मिट्टी के प्रकार - काली या रेगुर मिट्टी

  • भारत की काली मिट्टी, जिसे स्थानीय भाषा में 'रेगुर मिट्टी' या 'कपास की मिट्टी' भी कहा जाता है, दक्कन के पठारी क्षेत्र में विशेष रूप से पाई जाती है।
  • यह मिट्टी अपने गहरे काले रंग के लिए जानी जाती है, जो इसमें मौजूद टिटेनिफेरस मैग्नेटाइट और ज्वालामुखीय लावा के अवशेषों के कारण होता है।
  • महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों में यह मिट्टी बड़े पैमाने पर पाई जाती है।काली मिट्टी की सबसे खास बात है
  • इसकी अद्भुत जल धारण क्षमता। गर्मियों में सूखने पर यह मिट्टी गहरी दरारें बना लेती है, जो वर्षा के पानी को संचित करने में मदद करती हैं।
  • यह विशेषता इसे सूखे प्रतिरोधी बनाती है। मिट्टी की चिपचिपी प्रकृति और कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटाश व चूना जैसे पोषक तत्वों से भरपूर होने के कारण यह कपास की खेती के लिए आदर्श मानी जाती है। इसीलिए इसे 'कपास की मिट्टी' भी कहा जाता है।
  • इसके अलावा, सोयाबीन, अरहर, सूरजमुखी और गन्ना जैसी फसलें भी इस मिट्टी में अच्छी पैदावार देती हैं। हालांकि, इस मिट्टी में नाइट्रोजन और फॉस्फोरस की कुछ कमी होती है,
  • जिसे जैविक खाद और फसल चक्रण द्वारा पूरा किया जा सकता है। काली मिट्टी का भारतीय कृषि में विशेष महत्व है और यह देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देती है।

भारत में मिट्टी के प्रकार रेगिस्तानी मिट्टी

  • भारत के पश्चिमी राजस्थान, गुजरात और हरियाणा के कुछ हिस्सों में फैली रेगिस्तानी मिट्टी अपने अनूठे गुणों के लिए जानी जाती है।
  • यह मिट्टी मुख्य रूप से थार रेगिस्तान में पाई जाती है, जहां अत्यधिक तापमान और कम वर्षा इसकी विशेषताओं को निर्धारित करती है।
  • इस मिट्टी की सबसे बड़ी पहचान है इसका रेतीला स्वभाव और हल्का पीला-भूरा रंग। यह अत्यधिक पारगम्य होती है, जिसमें पानी तेजी से रिस जाता है।
  • पोषक तत्वों की दृष्टि से यह मिट्टी काफी गरीब मानी जाती है, क्योंकि इसमें जैविक पदार्थों की मात्रा नगण्य होती है। हालांकि, इसमें फॉस्फेट और नाइट्रेट की कुछ मात्रा पाई जाती है।
  • दिलचस्प बात यह है कि स्थानीय किसानों ने इस मिट्टी में बाजरा, मूंगफली और ग्वार जैसी फसलें उगाने की कला विकसित की है।
  • ये सभी फसलें कम पानी में पनप सकती हैं। रेगिस्तानी मिट्टी में कैक्टस और खजूर जैसे पौधे प्राकृतिक रूप से अच्छी तरह विकसित होते हैं।
  • आधुनिक तकनीकों और सिंचाई के नए तरीकों ने इस मिट्टी में कृषि की संभावनाओं को बढ़ाया है, जिससे यह क्षेत्र अब केवल 'मरुस्थल' नहीं, बल्कि कृषि विकास की नई संभावनाओं का केंद्र बन रहा है।

भारत में मिट्टी के प्रकार पर्वतीय मिट्टी

·         हिमालय और अन्य पहाड़ी इलाकों की मिट्टी प्रकृति की एक विशेष उपहार है। यह मिट्टी ऊँचाई के साथ-साथ रंग और गुणों में भी बदलती है।

·         जब हम ऊपर चढ़ते जाते हैं, मिट्टी का ढलान  होता दिखाई देता है किसी जगह गहरी भूरी, तो किसी जगह हल्की रेतीली।

इस मिट्टी की सबसे बड़ी विशेषता है इसमें मौजूद जैविक तत्वों की भरमार। पेड़-पौधों की गिरी हुई पत्तियाँ और जीव-जंतुओं के अवशेष सैकड़ों सालों में इस मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं।

·         यही कारण है कि हिमाचल और उत्तराखंड के तरह के राज्यों में सेब, नाशपाती और चाय की खेती इतनी अच्छी होती है।
लेकिन पहाड़ी मिट्टी के साथ एक बड़ी चुनौती भी जुड़ी है। ढलान वाले इलाकों में बारिश के साथ यह मिट्टी आसानी से बह जाती है। इसीलिए स्थानीय लोग सीढ़ीनुमा खेत बनाते हैं,

·         जिससे मिट्टी का कटाव रुके। आजकल वैज्ञानिक भी पहाड़ों पर मिट्टी बचाने के नए तरीके ढूंढ रहे हैं, ताकि यहाँ की खूबसूरत वादियाँ और उपजाऊ जमीन बची रहे।

·         यदि आपने कभी पहाड़ों की सैर की होगी, तो आपने खुद अनुभव किया होगा कि यहाँ की मिट्टी कितनी अलग और विशिष्ट होती है। यह न केवल पेड़-पौधों, बल्कि पहाड़ों पर बसे समाजों की जिंदगी की रेखा है।

6. भारत में लैटेराइट मिट्टी: विशेषताएं और उपयोग

  • लैटेराइट मिट्टी भारत के कुछ खास हिस्सों में पाई जाती है, खासकर केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और ओडिशा जैसे राज्यों में।
  • इस मिट्टी का रंग लाल या भूरा होता है, जो इसमें मौजूद आयरन और एल्युमिनियम ऑक्साइड की वजह से होता है।
  • यह मिट्टी ज्यादातर उन इलाकों में मिलती है जहाँ भारी बारिश होती है और तापमान अधिक रहता है।
  • लैटेराइट मिट्टी की एक बड़ी खासियत यह है कि यह पानी के साथ आसानी से घुलती नहीं है, लेकिन इसमें पोषक तत्वों की कमी होती है।
  • इस वजह से यह ज्यादातर फसलों के लिए उपजाऊ नहीं मानी जाती। हालाँकि, चाय, कॉफी, रबड़ और काजू जैसी फसलें इस मिट्टी में अच्छी तरह उगाई जा सकती हैं।
  • केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों में चाय और कॉफी के बागान इसी मिट्टी पर फलते-फूलते हैं।
  • इस मिट्टी का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि यह सूखने पर कड़ी हो जाती है,
  • इसलिए पुराने जमाने में इसका इस्तेमाल ईंटों के रूप में भवन निर्माण के लिए किया जाता था। आज भी कुछ ग्रामीण इलाकों में लैटेराइट मिट्टी से बनी ईंटों का उपयोग होता है।
  • अगर इस मिट्टी को उपजाऊ बनाना हो, तो जैविक खाद और हरी खाद का इस्तेमाल करना चाहिए।
  • साथ ही, मिट्टी की नमी बनाए रखने के लिए मल्चिंग जैसी तकनीकें भी फायदेमंद होती हैं। इस तरह, लैटेराइट मिट्टी का सही प्रबंधन करके इसे खेती के लिए बेहतर बनाया जा सकता है।

भारत में मिट्टी के प्रकार - पीट और दलदली मिट्टी

  • भारत के कुछ खास इलाकों में पाई जाने वाली पीट और दलदली मिट्टी अपने आप में एक अनोखी दुनिया समेटे हुए है।
  • केरल के बैकवाटर, पश्चिम बंगाल के सुंदरवन और कश्मीर घाटी के कुछ हिस्सों में यह मिट्टी प्रकृति के एक अद्भुत करिश्मे की तरह फैली हुई है।
  • इस मिट्टी की सबसे खास बात है इसका गहरा काला या भूरा रंग और स्पंज जैसी बनावट। सालों-साल तक पानी में डूबे रहने से पौधों के अवशेष पूरी तरह सड़कर इस मिट्टी में बदल जाते हैं।
  • यही वजह है कि इसमें जैविक पदार्थों की मात्रा सामान्य मिट्टी से कहीं ज्यादा होती है।
  • चावल की खेती के लिए तो यह मिट्टी मानो प्रकृति का खास तोहफा है। केरल और पश्चिम बंगाल के किसान सदियों से इस मिट्टी का फायदा उठा रहे हैं।
  • मगर दिलचस्प बात यह है कि ज्यादा नमी होने के कारण इसमें हवा की कमी होती है, जिससे कई फसलें नहीं उग पातीं।
  • आजकल पर्यावरणविद इस मिट्टी को लेकर खासे चिंतित हैं। दरअसल, यह मिट्टी बड़ी मात्रा में कार्बन सोखकर रखती है।
  • अगर दलदली इलाके सूखने लगें तो यह कार्बन वातावरण में मिलकर ग्लोबल वार्मिंग बढ़ा सकता है। इसीलिए केरल और अन्य राज्यों में अब इन खास इलाकों को बचाने के प्रयास तेज हो गए हैं।

 मृदा का महत्व (Importance of Soil)

मृदा हमारे जीवन और पर्यावरण का आधार है। यह न सिर्फ कृषि के लिए जरूरी है, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में भी अहम भूमिका निभाती है। मिट्टी पेड़-पौधों को जड़ें देकर उन्हें पोषण प्रदान करती है, जिससे हमें अनाज, फल, सब्जियां और औषधियां मिलती हैं। यह जल संचयन में मदद करके भूजल को रिचार्ज करती है और बाढ़ व सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाओं से बचाती है। मृदा में लाखों सूक्ष्मजीव रहते हैं, जो जैविक विविधता को बनाए रखते हैं। इसके अलावा, मिट्टी कार्बन सोखकर जलवायु परिवर्तन को कम करने में योगदान देती है। मानव सभ्यता के विकास में मृदा का योगदान अतुलनीय है - यह इमारतें बनाने, मिट्टी के बर्तनों और कलात्मक वस्तुओं के निर्माण में भी उपयोगी है। अगर मिट्टी की उर्वरता खत्म हो जाए, तो खाद्य संकट, पर्यावरण असंतुलन और आर्थिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए मृदा संरक्षण केवल किसानों की नहीं, बल्कि हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है।

  • कृषि के लिए आधार – फसलों की उपज मृदा की गुणवत्ता पर निर्भर करती है।
  • जल संचयन – मिट्टी भूजल को रिचार्ज करती है।
  • पारिस्थितिकी संतुलन – जीव-जंतुओं का आवास है।
  • इमारती उपयोग – ईंट, मिट्टी के बर्तन बनाने में काम आती है।
  1. जलवायु नियंत्रण – कार्बन स्टोर करके ग्लोबल वार्मिंग कम करती है।

मृदा की उर्वरता कैसे बढ़ाएं? (How to Improve Soil Fertility?)

मिट्टी की उर्वरता (Soil Fertility) कृषि उत्पादन की नींव है। अगर मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी हो जाए, तो फसलों की पैदावार और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होते हैं। आजकल रासायनिक खादों के अंधाधुंध उपयोग और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से मिट्टी की उर्वरता तेजी से घट रही है। ऐसे में जैविक और टिकाऊ तरीकों से मृदा की उर्वरता बढ़ाना जरूरी हो गया है।

  • कम्पोस्ट खाद का उपयोग
  • हरी खाद (Green Manure)
  • फसल चक्रण (Crop Rotation)
  • जैविक खेती (Organic Farming)
  • मल्चिंग (Mulching)

मृदा संरक्षण (Soil Conservation Methods)

  • हमारी धरती की उपजाऊ मिट्टी दिन-ब-दिन कम होती जा रही है, लेकिन कुछ सरल उपाय अपनाकर हम इसकी रक्षा कर सकते हैं। मिट्टी को बचाने का मतलब है - उसकी उर्वरता बनाए रखना, उसके कटाव को रोकना और खराब हो चुकी मिट्टी को फिर से जीवन देना।
  • ढलान वाले खेतों में समोच्च रेखाओं के साथ मेड़बंदी करना या सीढ़ीनुमा खेत बनाना बहुत कारगर तरीका है। जंगलों को कटने से बचाना और नए पेड़ लगाना भी मिट्टी को जकड़कर रखने में मदद करता है। किसान भाई आवरण फसलें उगाकर, मिश्रित खेती करके और फसलों का चक्र बदलकर मिट्टी को स्वस्थ रख सकते हैं।
  • बाढ़ और मिट्टी के कटाव का गहरा रिश्ता है। नदियों को आपस में जोड़ने जैसी योजनाएँ, जैसे गंगा-कावेरी लिंक, अतिरिक्त पानी को सही दिशा देकर मिट्टी बचा सकती हैं। चंबल के बीहड़ इलाकों में नालियों को ठीक करने और वहाँ पेड़ लगाने के काम ने मिट्टी के कटाव को काफी कम किया है।
  • पूर्वोत्तर के राज्यों और घाट के इलाकों में झूम खेती (जंगल काटकर खेती) एक बड़ी समस्या है। स्थानीय किसानों को सीढ़ीनुमा खेती सिखाकर और उन्हें बेहतर तरीके अपनाने के लिए प्रोत्साहित करके हम इस परंपरा को बदल सकते हैं। सरकार ने पूर्वोत्तर के सात राज्यों में एक खास योजना शुरू की है जो झूम खेती करने वालों को स्थायी खेती की तरफ मोड़ रही है।
  • याद रखें, स्वस्थ मिट्टी ही स्वस्थ फसल और स्वस्थ जीवन की गारंटी है। छोटे-छोटे प्रयासों से हम अपनी धरती की इस अनमोल धरोहर को बचा सकते हैं। आइए, मिलकर मिट्टी बचाएँ - हमारा भविष्य बचाएँ!

निष्कर्ष (Conclusion)

मृदा हमारे लिए अनमोल है, लेकिन अत्यधिक खेती, वनों की कटाई और प्रदूषण से यह तेजी से बर्बाद हो रही है। अगर हम अभी सचेत नहीं हुए, तो भविष्य में उपजाऊ जमीन की कमी हो सकती है। इसलिए, मृदा संरक्षण और जैविक खेती को अपनाकर हम इसकी उर्वरता बनाए रख सकते हैं।

 




Tags : Latest News | Agriculture | Himachal | Farming

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