अमोराहा क्षेत्र में ganne ki kheti केवल एक फसल नहीं, बल्कि किसानों की सालभर की कमाई का भरोसेमंद सहारा है। मगर हाल के वर्षों में रेड रॉट रोग ने इस भरोसे को बार-बार चुनौती दी है। यह बीमारी चुपचाप खेत में पनपती है, शुरू में पकड़ में नहीं आती और जब लक्षण साफ दिखते हैं, तब तक फसल को भारी नुकसान हो चुका होता है। राहत की बात यह है कि सही जानकारी, समय पर लिए गए फैसले और थोड़ी सतर्कता से रेड रॉट को काफी हद तक रोका जा सकता है।
यह लेख विशेष रूप से Amroha के किसानों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, ताकि वे अपनी Ganne ki kheti को सुरक्षित रखें और मेहनत की कमाई को नुकसान से बचा सकें।
Red Rot Ganne ki kheti में होने वाला एक गंभीर फफूंद जनित रोग है, जो फसल को बाहर से नहीं बल्कि अंदर से कमजोर करता है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती यही है कि संक्रमित पौधा लंबे समय तक हरा और स्वस्थ दिखाई देता है, जबकि तने के भीतर सड़न शुरू हो चुकी होती है। जब गन्ना काटा जाता है, तब अंदर लाल रंग के साथ सफेद रेखाएं साफ नजर आती हैं, जो इस रोग की पहचान हैं। इस संक्रमण के कारण गन्ने का वजन घटता है, रस की गुणवत्ता खराब होती है और चीनी रिकवरी में भारी गिरावट आती है। यही वजह है कि रेड रॉट को Ganne ki kheti का सबसे खतरनाक और नुकसानदायक रोग माना जाता है, क्योंकि यह सीधे किसान की उपज और आमदनी दोनों पर असर डालता है।
Amroha के गन्ना किसान आज खेती के साथ-साथ कई चुनौतियों से जूझ रहे हैं। खेती की लागत हर मौसम बढ़ती जा रही है, जबकि खेतों में जल निकास की समस्या और बदलता मौसम अनिश्चितता पैदा करता है। ऊपर से गन्ने का भुगतान देर से मिलने के कारण किसानों की नकदी व्यवस्था प्रभावित होती है। सीमित साधनों की वजह से कई किसान मजबूरी में पुराने बीज और पारंपरिक पद्धतियों पर निर्भर रहते हैं, जिससे रेड रॉट जैसी बीमारियों का खतरा और बढ़ जाता है। जब फसल को नुकसान होता है, तो उसका असर केवल खेत तक नहीं रहता, बल्कि घर की आमदनी, कर्ज चुकाने की क्षमता और अगले मौसम की तैयारी तक पहुंच जाता है। यही कारण है कि आज रोग से बचाव और बेहतर प्रबंधन अमोराहा के किसानों के लिए खेती से ज्यादा आजीविका की सुरक्षा का सवाल बन चुका है।
Red Rot से बचाव की सबसे मजबूत रणनीति इसकी समय पर पहचान है। यदि किसान शुरुआत में ही इसके लक्षण समझ लें, तो फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है। इस रोग में सबसे पहले पत्तियां ऊपर से सूखने लगती हैं और पौधे की बढ़वार कमजोर पड़ जाती है। जब गन्ने के तने को काटकर देखा जाता है, तो अंदर लाल रंग के साथ धारियां दिखाई देती हैं, जो संक्रमण का साफ संकेत हैं। कई मामलों में तने से अजीब या बदबूदार गंध भी आने लगती है। ऐसे पौधों को नजरअंदाज करना पूरे खेत के लिए जोखिम बन सकता है, इसलिए शुरुआती संकेत दिखते ही तुरंत कदम उठाना जरूरी होता है।
Red Rot से सुरक्षा की असली शुरुआत खेत की तैयारी से नहीं, बल्कि सही बीज गन्ने के चुनाव से होती है। अमोराहा के किसानों के लिए यह समझना जरूरी है कि बीमार खेत का बीज पूरे खेत को बीमार कर सकता है। जिन खेतों में पहले रेड रॉट की समस्या देखी गई हो, वहां से लिया गया बीज सबसे बड़ा जोखिम बन जाता है। कई बार सस्ता या आसानी से मिलने वाला बीज आकर्षक लगता है, लेकिन इसका नुकसान बाद में कहीं ज्यादा होता है। प्रमाणित और भरोसेमंद स्रोत से लिया गया स्वस्थ बीज शुरुआती खर्च जरूर बढ़ाता है, पर यही फैसला पूरी फसल को सुरक्षित रखने में सबसे अहम भूमिका निभाता है।
बीज उपचार Ganne ki kheti में किया जाने वाला एक छोटा कदम है, लेकिन इसका असर पूरी फसल पर पड़ता है। कई बार बीज गन्ना बाहर से स्वस्थ दिखता है, लेकिन उसके साथ रोग के कीटाणु भी खेत में पहुंच जाते हैं। बुवाई से पहले यदि बीज को गर्म पानी या अनुशंसित फफूंदनाशक घोल में उपचारित कर लिया जाए, तो ये हानिकारक बीजाणु नष्ट हो जाते हैं। इससे रोग की शुरुआत वहीं रुक जाती है और फसल को शुरुआत से ही मजबूत आधार मिलता है, जो आगे चलकर रेड रॉट जैसी बीमारियों से बचाव में मदद करता है।
Red Rot रोग को फैलने के लिए सबसे अनुकूल स्थिति खेत में अधिक नमी और रुका हुआ पानी है। अमोराहा क्षेत्र की भारी मिट्टी में पानी देर तक ठहर जाता है, जिससे गन्ने की जड़ें कमजोर होने लगती हैं और रोग तेजी से पकड़ बना लेता है। ऐसे में खेत की नालियों को साफ रखना और बारिश के बाद तुरंत पानी बाहर निकालना बेहद जरूरी हो जाता है। जरूरत से ज्यादा सिंचाई भी उतनी ही नुकसानदायक है, जितना जलभराव। गन्ने के लिए आदर्श स्थिति बहुत सूखा खेत नहीं, बल्कि नियंत्रित नमी वाला खेत है, जो फसल को मजबूत बनाए रखता है और रेड रॉट के जोखिम को काफी हद तक कम कर देता है।
Ganne की अच्छी बढ़वार के चक्कर में कई बार जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन डाल दी जाती है। इससे फसल बाहर से हरी-भरी तो दिखती है, लेकिन उसकी रोगों से लड़ने की ताकत कम हो जाती है। इसलिए नाइट्रोजन के साथ फॉस्फोरस और पोटाश का संतुलित उपयोग जरूरी है। खासतौर पर पोटाश पौधे को अंदर से मजबूत बनाता है और रेड रॉट जैसे रोगों के प्रभाव को कम करने में मदद करता है।
इसके साथ ही खेत की नियमित निगरानी बेहद जरूरी है। यदि कहीं भी रेड रॉट के लक्षण दिखाई दें, तो ऐसे पौधों को देर किए बिना उखाड़कर खेत से बाहर निकालना चाहिए। संक्रमित गन्नों को न तो पशुओं को खिलाना चाहिए और न ही खेत में छोड़ना चाहिए, क्योंकि इससे रोग फैल सकता है। इन्हें गड्ढे में दबाकर या सुरक्षित तरीके से नष्ट करना बाकी फसल को बचाने का सबसे प्रभावी उपाय है।
लगातार कई साल तक एक ही किस्म की Ganne ki kheti करने से खेत में रोगों का असर बढ़ने लगता है और रेड रॉट जैसी बीमारी स्थायी रूप ले सकती है। जब हर मौसम में फसल और किस्म बदली नहीं जाती, तो मिट्टी में रोग के कारक जमा होते जाते हैं। ऐसे में फसल चक्र अपनाना और समय-समय पर किस्मों में बदलाव करना बेहद जरूरी हो जाता है। रेड रॉट सहनशील किस्मों का चयन करने से फसल की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और खेत में बीमारी का दबाव धीरे-धीरे कम होता है। सही किस्म और संतुलित फसल चक्र गन्ने को स्वस्थ रखने के साथ-साथ किसानों की उपज और आय दोनों को सुरक्षित रखते हैं।
Red Rot ऐसी बीमारी नहीं है जिससे घबराकर गन्ने की खेती छोड़ दी जाए। यह रोग दरअसल इस बात का संकेत है कि अब खेती केवल मेहनत से नहीं, बल्कि सही जानकारी और समझदारी से करनी होगी। स्वस्थ बीज का चयन, संतुलित प्रबंधन, खेत की नियमित निगरानी और सही समय पर उठाए गए कदम मिलकर इस बीमारी को काफी हद तक नियंत्रित कर सकते हैं। अगर अमोराहा के किसान इन बातों पर ध्यान दें, तो वे अपनी ganne ki kheti को सुरक्षित रखते हुए नुकसान से बच सकते हैं और अपनी आय को लंबे समय तक स्थिर बना सकते हैं।
रेड रॉट मुख्य रूप से संक्रमित बीज गन्ने, जलभराव, अधिक नमी और एक ही किस्म को बार-बार बोने से फैलता है।
हाँ, समय पर नियंत्रण न होने पर यह धीरे-धीरे पूरे खेत में फैल सकता है और भारी नुकसान कर सकता है।
स्वस्थ और प्रमाणित बीज का उपयोग, बुवाई से पहले बीज उपचार और खेत में सही जल निकास सबसे आसान और प्रभावी उपाय हैं।
नहीं, संक्रमित गन्ने को न पशुओं को खिलाना चाहिए और न ही खेत में छोड़ना चाहिए। इससे रोग और फैल सकता है।
हाँ, सहनशील किस्में और फसल चक्र अपनाने से रेड रॉट का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।
भारी मिट्टी, जल निकास की समस्या और लगातार एक ही किस्म की ganne ki kheti इसके खतरे को बढ़ा देती है।