“उद्यान फसलों पर अनुसंधान एवं प्रसार विशेषज्ञ कार्यशाला” का दो दिवसीय आयोजन आज सम्पन्न हुआ। कार्यशाला में कटाई उपरांत प्रबंधन, प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन, मशीनीकरण, संरक्षित खेती, मशरूम उत्पादन तकनीक तथा सतत संसाधन प्रबंधन पर विशेष जोर दिया गया, ताकि किसानों की आय और कृषि की स्थिरता को बढ़ाया जा सके।
तकनीकी सत्र की अध्यक्षता निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ. माखन सिंह भुल्लर ने की। सत्र में पुष्पोत्पादन, कटाई उपरांत प्रबंधन, कृषि अभियांत्रिकी, सूक्ष्मजीव विज्ञान, खाद्य प्रसंस्करण, वानिकी, प्राणी विज्ञान तथा कृषि अर्थशास्त्र से जुड़े विषयों पर विशेषज्ञों ने विचार प्रस्तुत किए। सत्र का समन्वय डॉ. टी.एस. रियार ने किया, जबकि सह-समन्वयक के रूप में डॉ. जी.एस. मक्कड़ उपस्थित रहे।
डॉ. परमिंदर सिंह ने लिली में गुणवत्तापूर्ण पुष्प उत्पादन के लिए नियमन तकनीकों पर प्रकाश डाला। डॉ. शालिनी झांझी ने गुलदाउदी के कटाई उपरांत प्रबंधन से शेल्फ लाइफ बढ़ाने की जानकारी दी। डॉ. स्वाति कपूर ने फलों एवं सब्जियों के वैज्ञानिक प्रबंधन से नुकसान कम कर लाभ बढ़ाने पर जोर दिया। डॉ. महेश कुमार नरंग ने उद्यान फसलों में उपयुक्त मशीनरी के प्रयोग से श्रम घटाने और दक्षता बढ़ाने की आवश्यकता बताई।
डॉ. समनप्रीत कौर बावेजा ने वर्षा जल प्रबंधन एवं भूजल पुनर्भरण के लिए बायो-रिटेंशन सेल्स की उपयोगिता पर चर्चा की। डॉ. उर्मिला गुप्ता ने बायोएंजाइम आधारित उत्पादों की तकनीक साझा की, जिनमें ग्रामीण उद्यमिता की संभावनाएं हैं। डॉ. शिवानी शर्मा ने एल्म ऑयस्टर एवं पिंक ऑयस्टर मशरूम की उन्नत खेती तकनीक का प्रदर्शन किया। डॉ. प्रीतिंदर कौर ने काली गाजर से कांजी, जैम और चटनी जैसे मूल्य संवर्धित उत्पादों की जानकारी दी, जबकि डॉ. नेहा बब्बर ने उद्यान फसलों के प्रसंस्करण से एग्री-स्टार्टअप्स को सशक्त बनाने पर विचार रखा।
फसल सुरक्षा के संदर्भ में डॉ. नीना सिंगला ने कुतरने वाले जीवों के प्रबंधन पर प्रकाश डाला तथा डॉ. राकेश कुमार गर्ग ने पंजाब में कैसुरिना की खेती की संभावनाएं बताईं। आईसीएआर-सीआईपीएचईटी के डॉ. राहुल कुमार अनुराग ने कटाई उपरांत अभियांत्रिकी तकनीकों और मूल्य संवर्धित उत्पादों पर जानकारी दी। डॉ. जे.एम. सिंह ने पंजाब में उद्यान फसलों की आर्थिक स्थिति प्रस्तुत करते हुए किसानों की आय बढ़ाने में बागवानी की भूमिका रेखांकित की।
डॉ. पूनम ए. सचदेव ने एग्री-बिजनेस इनक्यूबेशन सेंटर की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए प्रौद्योगिकी व्यावसायीकरण, मार्गदर्शन एवं बाजार संपर्क की आवश्यकता पर बल दिया।
समापन अवसर पर डॉ. भुल्लर ने कहा कि वैज्ञानिक कटाई उपरांत प्रबंधन, मशीनीकरण, संरक्षित खेती और मूल्य संवर्धन उद्यानिकी को लाभकारी एवं टिकाऊ उद्यम में बदलने के प्रमुख स्तंभ हैं। उन्होंने प्रसार विशेषज्ञों से अनुसंधान एवं किसानों के बीच सेतु की भूमिका निभाने का आह्वान किया।
कार्यशाला के अंत में संवादात्मक सत्र आयोजित किया गया। इससे पूर्व प्रतिभागियों ने विभिन्न प्रयोगात्मक एवं प्रदर्शन इकाइयों का अवलोकन कर अनुसंधान आधारित तकनीकों के व्यावहारिक अनुप्रयोगों को देखा। यह कार्यशाला उद्यानिकी क्षेत्र में विविधीकरण और एग्री-स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल सिद्ध हुई।