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नरेंद्र अहलावत की कहानी खेतों से पहचान तक का सफ़र PPP Portal Haryana

20 Dec, 2025 04:12 PM

हरियाणा के गाँव में रहने वाले किसान नरेंद्र अहलावत की प्रेरक कहानी, जहाँ गेहूं की खेती के साथ PPP Portal Haryana की जानकारी ने उसकी सोच, पहचान और भविष्य को नई दिशा दी।

FasalKranti
Rahul Saini, समाचार, [20 Dec, 2025 04:12 PM]
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हरियाणा के पश्चिमी हिस्से में बसा एक छोटा-सा गाँव बड़ौली। कच्ची गलियाँ, चारों तरफ़ फैले खेत, सुबह-शाम गूंजती पशुओं की आवाज़ें और लोगों के चेहरों पर मेहनत की सादगी—यही इस गाँव की पहचान थी। इसी गाँव में रहते थे नरेंद्र अहलावत, एक साधारण किसान, जिनकी ज़िंदगी मिट्टी, पसीने और उम्मीद के इर्द-गिर्द घूमती थी।

नरेंद्र अहलावत के पास लगभग पाँच एकड़ ज़मीन थी। यह ज़मीन उन्हें उनके पिता से विरासत में मिली थी। उनके पिता हमेशा कहा करते थे,
“बेटा, ज़मीन माँ जैसी होती है, इसे समझो, यह कभी भूखा नहीं रखेगी।”
नरेंद्र ने इस बात को सिर्फ़ सुना नहीं था, बल्कि जीया भी था। वे सालों से अपने खेत में गेहूं की खेती करते आ रहे थे। हर साल वही चक्र—जुताई, बुवाई, सिंचाई, देखभाल और फिर कटाई। बाहर से देखने में सब एक जैसा लगता, लेकिन हर साल की कहानी अलग होती।

किसान की सुबह और जिम्मेदारियाँ

नरेंद्र की सुबह सूरज से पहले शुरू होती थी। जब आसमान में हल्की-सी रोशनी होती, तब वह उठ जाते। हाथ-मुँह धोकर सबसे पहले पशुओं को चारा डालते, फिर खेत की तरफ़ निकल पड़ते। खेत में खड़े होकर वह मिट्टी को हाथ में लेकर उसकी नमी जाँचते। कभी-कभी वह खुद से ही बात करने लगते,
“इस बार पानी ठीक है… बस मौसम साथ दे।”

उनकी पत्नी सुनीता घर संभालती थीं, लेकिन खेती में भी उनका बड़ा हाथ था। कभी निराई-गुड़ाई में मदद करना, कभी कटाई के समय खाना पहुँचाना—वे हर काम में साथ थीं। उनके दो बच्चे थे—बड़ा बेटा अंकित, जो बारहवीं में पढ़ता था, और छोटी बेटी राधिका, जो स्कूल जाती थी। नरेंद्र चाहते थे कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर कुछ और बनें, ताकि उन्हें वही संघर्ष न झेलना पड़े जो उन्होंने झेला था।

गेहूं की फसल: उम्मीद और चिंता साथ-साथ

उस साल नरेंद्र ने समय पर गेहूं की बुवाई की थी। बीज अच्छे चुने थे, खाद भी ठीक डाली थी। फसल बढ़िया खड़ी थी। जब हवा चलती, तो सुनहरी बालियाँ ऐसे लहरातीं जैसे धरती मुस्कुरा रही हो। गाँव के लोग कहते,
“नरेंद्र, इस बार तो तेरी फसल बढ़िया है।”

लेकिन किसान का मन कभी पूरी तरह निश्चिंत नहीं होता। खर्च लगातार बढ़ रहा था—डीज़ल, खाद, मजदूरी। ऊपर से यह डर भी कि फसल बेचते वक्त क्या होगा। मंडी में लाइन, कागज़, भुगतान की देरी—ये सब बातें उसे रातों को सोचने पर मजबूर कर देती थीं।

अचानक मिली एक नई जानकारी

एक दिन गाँव की चौपाल पर पंचायत की बैठक थी। नरेंद्र भी वहाँ गया। कुछ सरकारी कर्मचारी आए थे और वे किसी नई योजना के बारे में बता रहे थे। बातचीत के बीच एक शब्द बार-बार सामने आ रहा था— ppp portal haryana.

नरेंद्र ने ध्यान से सुना। कर्मचारी बता रहे थे कि PPP यानी परिवार पहचान पत्र के ज़रिए सरकार हर परिवार की जानकारी एक जगह दर्ज कर रही है, ताकि योजनाओं का लाभ सही लोगों तक पहुँच सके। सत्यापन ज़रूरी है, वरना कई सुविधाएँ अटक सकती हैं।

नरेंद्र के मन में हल्की-सी घबराहट हुई। उसने अपने पड़ोसी महेंद्र से पूछा,
“भाई, ये PPP वाला काम न किया तो क्या होगा?”
महेंद्र ने कंधे उचकाते हुए कहा,
“कहते हैं कि आगे चलकर हर काम इसी से जुड़ा होगा।”

नरेंद्र चुप हो गया। उसे लगा कि खेती के साथ-साथ अब कागज़ी काम भी उतना ही ज़रूरी हो गया है।

घर में चर्चा और निर्णय

शाम को घर आकर नरेंद्र ने सुनीता को सारी बात बताई। सुनीता ने शांत स्वर में कहा,
“सरकार की बात है, टालने से अच्छा है समझकर कर लिया जाए।”

अगले दिन अंकित भी इस बातचीत में शामिल हुआ। उसने कहा,
“पापा, ये पोर्टल ऑनलाइन होता है। मैं आपकी मदद कर दूँगा।”

नरेंद्र को थोड़ा संकोच हुआ। उसे तकनीक से ज़्यादा लगाव नहीं था। मोबाइल का इस्तेमाल वह कॉल और मैसेज तक ही सीमित रखता था। लेकिन बच्चों की बात सुनकर उसे भरोसा हुआ।

PPP पोर्टल का अनुभव: डर से भरोसे तक

कुछ दिन बाद नरेंद्र अपने परिवार के साथ नज़दीकी सेवा केंद्र पहुँचा। वहाँ पहले से कई लोग बैठे थे। नरेंद्र को ऐसे दफ्तरों में जाना हमेशा भारी लगता था। उसे डर था कि कहीं कोई कागज़ कम न निकल आए।

जब उसकी बारी आई, तो ऑपरेटर ने बड़े धैर्य से सब समझाया—आधार कार्ड, परिवार की जानकारी, मोबाइल नंबर। नरेंद्र बीच-बीच में पूछता,
“भाई, इससे खेती पर असर तो नहीं पड़ेगा?”
ऑपरेटर मुस्कराकर बोला,
“नुकसान नहीं होगा, फायदा ही मिलेगा। योजनाओं का लाभ सीधा मिलेगा।”

सत्यापन पूरा हुआ। नरेंद्र ने राहत की साँस ली। उसे लगा जैसे उसने कोई बड़ा बोझ उतार दिया हो।

बदलती सोच और आत्मविश्वास

कुछ ही दिनों में नरेंद्र ने फर्क महसूस किया। जब वह किसी सरकारी काम के लिए गया, तो उसकी जानकारी पहले से सिस्टम में थी। बार-बार वही कागज़ दिखाने की ज़रूरत नहीं पड़ी। उसे एहसास हुआ कि यह योजना सिर्फ़ कागज़ी औपचारिकता नहीं, बल्कि समय और मेहनत बचाने का ज़रिया है।

अब वह गाँव के दूसरे किसानों को भी समझाने लगा। जो लोग कहते थे,
“हमें इन झंझटों से क्या लेना,”
उन्हें वह अपने अनुभव सुनाता।

खेत में खड़ा बदला हुआ किसान

एक शाम नरेंद्र अपने खेत में खड़ा था। सूरज ढल रहा था और आसमान में हल्की लालिमा फैल रही थी। उसने गेहूं की फसल को देखा और मन ही मन सोचा,
“खेती सिर्फ़ हल चलाने का नाम नहीं रहा। अब जानकारी भी उतनी ही ज़रूरी है।”

उसे लगा कि जैसे उसने अपने जीवन में एक नया अध्याय शुरू किया है। वह अभी भी वही किसान था—मिट्टी से जुड़ा, मेहनती—लेकिन अब थोड़ा और जागरूक, थोड़ा और आत्मविश्वासी।

गाँव में असर

धीरे-धीरे गाँव के लोग नरेंद्र से PPP portal haryana के बारे में पूछने लगे। वह सबको यही कहता,
“डरने की ज़रूरत नहीं। समझकर काम करो, फायदा मिलेगा।”

सरपंच ने भी एक दिन कहा,
“नरेंद्र, तूने सही समय पर सही कदम उठाया। अब गाँव के और लोग भी आगे आ रहे हैं।”

नरेंद्र को गर्व महसूस हुआ, लेकिन वह जानता था कि असली जीत तब है, जब हर किसान को उसकी मेहनत का पूरा सम्मान मिले।

कहानी का सार

नरेंद्र अहलावत की कहानी किसी बड़े चमत्कार की नहीं है। यह कहानी है समझदारी, सीखने और बदलते समय के साथ कदम मिलाने की। हरियाणा के एक छोटे से गाँव का यह किसान आज भी गेहूं उगाता है, खेतों में पसीना बहाता है, लेकिन अब वह सरकारी योजनाओं और अपनी पहचान को लेकर भी सजग है।

उसने यह समझ लिया है कि किसान सिर्फ़ अन्न उगाने वाला नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक भी है। सही जानकारी, सही समय पर लिया गया निर्णय और थोड़ा-सा साहस—यही उसकी असली ताकत बन गए हैं।

 




Tags : PPP Portal Haryana |

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