राजस्थान की पारंपरिक फसल ग्वार (क्लस्टर बीन) को फिर से किसानों की आय का प्रमुख स्रोत बनाने के लिए एक नई पहल शुरू की गई है। जोधपुर स्थित एनजीओ साउथ एशिया बायो टेक्नोलॉजी सेंटर और बाड़मेर की आदर्श ग्वार गम इंडस्ट्री ने मिलकर "सस्टेनेबल ग्वार इनिशिएटिव" लॉन्च किया है। इसका उद्देश्य ग्वार की खेती को बढ़ावा देकर किसानों की आय बढ़ाना और उद्योग को गुणवत्तापूर्ण कच्चा माल उपलब्ध कराना है ।
राजस्थान भारत के कुल ग्वार उत्पादन का 85% योगदान देता है, जो वैश्विक स्तर पर 90% से अधिक है। 2012-13 में अमेरिका में हाइड्रोलिक फ्रैकिंग (फ्रैकिंग) के लिए ग्वार गम की मांग बढ़ने से इसकी कीमतें 30,000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई थीं। लेकिन अब कीमतें घटकर 5,000-5,500 रुपये प्रति क्विंटल रह गई हैं, जिससे किसानों को नुकसान हो रहा है।
किसानों को आधुनिक तकनीक से जोड़ना: बेहतर बीज, सिंचाई प्रबंधन और उन्नत खेती के तरीके सिखाए जाएंगे।
बाजार में स्थिरता लाना: ग्वार गम, खाद्य, चारा, फार्मा और कॉस्मेटिक उद्योगों के लिए नए बाजार विकसित किए जाएंगे।
निष्पक्ष मूल्य दिलाना: किसानों और उद्योगों के बीच सीधा संपर्क बढ़ाकर मध्यस्थों की भूमिका कम की जाएगी।
2023-24 में ग्वार गम का निर्यात 4.2 लाख टन (541.65 मिलियन डॉलर) तक पहुंच गया। इसके अलावा, ग्वार के सब-प्रोडक्ट्स जैसे जैविक खाद्य, पशु चारा और ब्यूटी प्रोडक्ट्स में भी इसकी मांग बढ़ रही है। इस पहल से कच्चे तेल बाजार की अस्थिरता और भू-राजनीतिक चुनौतियों के बीच भी ग्वार की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिलेगी।
एनजीओ के निदेशक भागीरथ चौधरी के अनुसार, "यह पहल किसानों को उचित मूल्य दिलाने के साथ-साथ पर्यावरण अनुकूल खेती को भी बढ़ावा देगी। राजस्थान के छोटे किसान इससे सबसे अधिक लाभान्वित होंगे।"
सस्टेनेबल ग्वार इनिशिएटिव से न केवल राजस्थान के किसानों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी, बल्कि भारत को वैश्विक ग्वार बाजार में और मजबूती मिलेगी। सरकार और निजी संस्थानों के सहयोग से यह पहल ग्वार की खेती को फिर से "सुनहरे दिन" दिला सकती है।