Haryana: A Leading State in Rice and Wheat Production in India
हरियाणा : धान और गेहूं उत्पादन में देश का अग्रणी राज्य
27 May, 2025 02:07 PM
हरियाणा, भारत के उत्तरी भाग में स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण कृषि प्रधान राज्य है, जो विशेष रूप से धान और गेहूं उत्पादन के क्षेत्र में देश की रीढ़ की हड्डी माना जाता है।
FasalKranti
Emren, समाचार, [27 May, 2025 02:07 PM]
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हरियाणा, भारत के उत्तरी भाग में स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण कृषि प्रधान राज्य है, जो विशेष रूप से धान और गेहूं उत्पादन के क्षेत्र में देश की रीढ़ की हड्डी माना जाता है। यह राज्य वर्ष 1966 में पंजाब से अलग होकर बना और तब से ही हरियाणा ने हरित क्रांति में अहम भूमिका निभाई है। हरियाणा की लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या आज भी कृषि पर निर्भर है, और राज्य की कुल कृषि भूमि का अधिकांश भाग धान और गेहूं की खेती के अंतर्गत आता है। यहाँ की उन्नत सिंचाई प्रणाली, विशेषकर भाखड़ा नहर प्रणाली, उपजाऊ दोमट मिट्टी, और अनुकूल जलवायु परिस्थितियाँ धान और गेहूं की बेहतर उपज में सहायक रही हैं। इसके अलावा, हरियाणा के किसानों ने आधुनिक कृषि तकनीकों जैसे कि हाईब्रिड बीज, ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, सॉयल हेल्थ कार्ड, ड्रिप इरिगेशन, और कृषि वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन का भरपूर उपयोग किया है, जिससे राज्य की उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
हरियाणा में करनाल, कुरुक्षेत्र, कैथल, अंबाला, यमुनानगर, पानीपत, और सोनीपत जैसे जिले धान उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं, जबकि रोहतक, झज्जर, हिसार, फतेहाबाद, और सिरसा जैसे जिले गेहूं उत्पादन में अग्रणी हैं। यहाँ की मंडियाँ हर साल लाखों टन अनाज की सरकारी खरीद करती हैं, जिससे न केवल राज्य बल्कि पूरे देश की खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित होती है। इस लेख में हम विस्तार से अध्ययन करेंगे कि कैसे हरियाणा की भौगोलिक स्थिति और जलवायु धान और गेहूं की खेती के लिए अनुकूल हैं, कौन-सी तकनीकी विधियाँ अपनाई जा रही हैं, किसानों को किस प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है जैसे जल संकट, मिट्टी की गिरती गुणवत्ता, और बदलता मौसम साथ ही राज्य और केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाएँ जैसे प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, मृदा स्वास्थ्य योजना, और किसान सम्मान निधि आदि। अंततः, हम भविष्य की उन संभावनाओं पर भी चर्चा करेंगे जिनसे हरियाणा कृषि के क्षेत्र में और भी आत्मनिर्भर और टिकाऊ बन सकता है, जैसे जल-संरक्षण तकनीकों का विस्तार, जैविक खेती को बढ़ावा, और कृषि सहकारी समितियों की भूमिका का सुदृढ़ीकरण। हरियाणा का भौगोलिक और जल वायु स्वरूप हरियाणा उत्तर भारत के पंजाब, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली से घिरा हुआ है। यह राज्य सिंचित गंगा-यमुना दो आब क्षेत्र में स्थित है, जो उपजाऊ भूमि और जल स्रोतों से भरपूर है । यहाँ की मिट्टी मुख्यतः दो प्रकार की है: दोमट (loamy) और बलुई (sandy), जो धान और गेहूं दोनों की खेती के लिए उपयुक्त है।राज्य की जलवायु अर्ध-शुष्क (semi-arid) है, जिसमें ठंडी सर्दियां और गर्म ग्रीष्म ऋतुएं होती हैं। मानसून के दौरान जून से सितंबर तक वर्षा होती है, जो धान की खेती के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण
धान और गेहूं की खेती में हरियाणा का योगदान धान उत्पादन धान हरियाणा में मुख्यतः खरीफ फसल के रूप में उगाया जाता है, जिसकी बुवाई जून से जुलाई के बीच मानसून की शुरुआत के साथ की जाती है और कटाई अक्टूबर से नवंबर के बीच होती है। हरियाणा में करनाल, कुरुक्षेत्र, यमुनानगर, फरीदाबाद, कैथल, अंबाला, पानीपत, और सिरसा जैसे जिलों में धान की खेती विशेष रूप से बड़े पैमाने पर की जाती है। राज्य की लगभग 13 लाख हेक्टेयर भूमि पर धान की खेती होती है। हरियाणा की सिंचित भूमि, विशेष रूप से भाखड़ा नहर प्रणाली और ट्यूबवेल सिंचाई, धान की खेती के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होती है। यहाँ की दोमट मिट्टी और गर्म व आद्र्र जलवायु धान की उपज बढ़ाने में सहायक होती है।राज्य में बासमती और गैर-बासमती दोनों प्रकार के धान की खेती होती है। बासमती चावल, विशेषकर 'पुसा बासमती 1121', 'पुसा बासमती 1509' और 'हरियाणा बासमती' जैसी किस्में उच्च गुणवत्ता और सुगंध के लिए विश्वप्रसिद्ध हैं। इनकी माँग न केवल भारत में बल्कि विदेशों जैसे मध्य-पूर्व, यूरोप और अमेरिका में भी अत्यधिक है। हरियाणा बासमती चावल के प्रमुख निर्यातक राज्यों में शामिल है, जिससे राज्य को विदेशी मुद्रा अर्जित होती है और किसानों की आय में वृद्धि होती है। गैर-बासमती धान में ‘PR’, ‘IR’ और ‘Hybrid’ किस्मों का प्रयोग किया जाता है, जिनका उपयोग मुख्यतः घरेलू उपभोग और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) में किया जाता है। इसके अलावा, हरियाणा सरकार और कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा किसानों को समय-समय पर उन्नत किस्मों, रोग-प्रतिरोधी बीजों, सटीक उर्वरक उपयोग और जल प्रबंधन के तरीकों की जानकारी दी जाती है, जिससे उत्पादन क्षमता और गुणवत्ता दोनों में सुधार हो रहा है।धान की खेती से जुड़ी एक प्रमुख चुनौती जल की अत्यधिक खपत है। हरियाणा में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है, विशेषकर धान उगाने वाले जिलों में। इस कारण सरकार सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली, जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर, को बढ़ावा दे रही है और "मेरा पानी, मेरी विरासत" जैसी योजनाओं के माध्यम से किसानों को कम पानी में धान के विकल्प की ओर प्रेरित कर रही है। इसके बावजूद, धान अभी भी राज्य की अर्थव्यवस्था और किसानों की आजीविका में केंद्रीय भूमिका निभाता है।गेहूं हरियाणा की रबी फसल का मुख्य हिस्सा है। नवंबर से अप्रैल तक गेहूं की फसल लगाई जाती है। यह फसल ठंडे मौसम में अच्छी वृद्धि करती है और राज्य के लगभग सभी जिलों में व्यापक पैमानेपरउगाईजातीहै।हरियाणा भारत के प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में से एक है, जो देश के खाद्यान्न भंडार के लिए महत्वपूर्ण योगदान देता है। धान और गेहूं की खेती की तकनीकी प्रगति हरियाणा में धान और गेहूं की उन्नत किस्मों ने राज्य को देश के अग्रणी अन्न उत्पादक राज्यों में शामिल करने में अहम भूमिका निभाई है। बासमती चावल की बात करें तो राज्य में उच्च उत्पादकता वाली किस्मों को बड़े पैमाने पर अपनाया गया है, जिनमें प्रमुख रूप से ‘पुष्पा (Pusa Basmati 1509)’, ‘पी.आर.126’, और ‘पी.यू.एस.ए 1121 (Pusa Basmati 1121)’ शामिल हैं। ‘पी.यू.एस.ए 1121’ को इसकी लंबी दानेदार बनावट, खास खुशबू और बेहतर निर्यात योग्यता के कारण विशेष रूप से लोकप्रियता प्राप्त है। यह किस्म हरियाणा के अलावा पंजाब और उत्तर प्रदेश में भी व्यापक रूप से बोई जाती है, लेकिन हरियाणा इसके प्रमुख उत्पादक राज्यों में से एक है। ‘पी.आर.126’ एक गैर-बासमती किस्म है, जो कम समय में पकने वाली, अधिक उत्पादन देने वाली और रोग प्रतिरोधक है। यह किस्म जल की कम खपत करती है, जिससे यह पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी उपयुक्त मानी जाती है।
‘पुष्पा (1509)’ को इसकी जल्दी पकने की क्षमता, अधिक पैदावार और अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा योग्य गुणवत्ता के कारण किसान तेजी से अपना रहे हैं। गेहूं की खेती में भी हरियाणा अग्रणी राज्य है और यहाँ कई उन्नत किस्में किसानों द्वारा अपनाई जाती हैं।
‘एचडी 2967’ गेहूं की एक प्रसिद्ध उच्च उत्पादकता वाली किस्म है, जो रतुआ (ब्लास्ट), झुलसा और पत्तियों में लगने वाले रोगों के प्रति सहनशील मानी जाती है। यह किस्म 120-125 दिनों में तैयार हो जाती है और उपयुक्त कृषि तकनीकों के साथ प्रति हेक्टेयर 50-60 क्विंटल तक उत्पादन देती है। ‘डब्ल्यूएच 1105’ हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (हिसार) द्वारा विकसित की गई एक किस्म है, जो सूखा सहन करने में सक्षम, मजबूत डंठल वाली और गेहूं की गुणवत्ता को बनाए रखने वाली है। ‘पी.बी.डब्ल्यू 343’ एक पुरानी लेकिन भरोसेमंद किस्म है, जो लंबे समय तक गेहूं उत्पादन का मुख्य आधार रही है। यह मध्यम अवधि में तैयार होती है और अनुकूल परिस्थितियों में अच्छी पैदावार देती है।
इन उन्नत किस्मों के व्यापक उपयोग से हरियाणा में प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है। इसके अलावा, राज्य में कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs), हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय और सरकारी योजनाओं की मदद से किसानों को इन किस्मों की जानकारी, प्रशिक्षण और उचित बीज समय पर उपलब्ध कराए जाते हैं, जिससे उत्पादन क्षमता और गुणवत्ता दोनों में निरंतर सुधार हो रहा है। इन उन्नत किस्मों के कारण ही हरियाणा भारतीय खाद्यान्न आपूर्ति में एक मजबूत स्तंभ बना हुआ है। सिंचाई प्रणाली हरियाणा की सिंचाई प्रणाली राज्य की कृषि सफलता की रीढ़ मानी जाती है, जो विशेष रूप से धान और गेहूं जैसे जल-आधारित फसलों के उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। राज्य में सिंचाई के तीन मुख्य स्रोत हैं: नहरें, ट्यूबवेल, और पम्पिंग सेट्स। इन स्रोतों के सहारे राज्य की लगभग 85 प्रतिशत कृषि भूमि सिंचित है, जो देश के औसत से काफी अधिक है। नहर प्रणाली हरियाणा की सबसे प्रमुख और परंपरागत सिंचाई व्यवस्था है। भाखड़ा नंगल और पश्चिमी यमुना नहर प्रणाली राज्य की प्रमुख नहरें हैं, जो हिमालय की नदियों से जल लाकर खेतों तक पहुंचाती हैं। करनाल, कुरुक्षेत्र, अंबाला, और यमुनानगर जैसे जिलों में इन नहरों के माध्यम से धान की खेती को भरपूर पानी मिलता है। हरियाणा सरकार ने समय-समय पर नहरों की सफाई, पक्कीकरण और लाइनिंग जैसी योजनाओं के माध्यम से जल क्षति को कम करने और कुशल जल वितरण को सुनिश्चित करने के प्रयास किए हैं।
ट्यूबवेल और पंपिंग सेट्स विशेष रूप से उन क्षेत्रों में उपयोग किए जाते हैं जहाँ नहरों का जल या तो नहीं पहुंचता या अपर्याप्त होता है। राज्य में लाखों की संख्या में बिजली और डीजल चालित ट्यूबवेल हैं, जो भूमिगत जल का दोहन करते हैं। हालांकि, अत्यधिक ट्यूबवेल उपयोग के कारण कई जिलों में भूजल स्तर खतरनाक रूप से नीचे जा चुका है। करनाल, कैथल, कुरुक्षेत्र और फतेहाबाद जैसे जिलों में यह स्थिति विशेष रूप से गंभीर है। इस समस्या से निपटने के लिए राज्य सरकार ने भूजल संरक्षण पर बल देना शुरू किया है। जल संरक्षण की दिशा में हरियाणा में ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर सिस्टम जैसी आधुनिक विधियाँ धीरे-धीरे अपनाई जा रही हैं। ये विधियाँ विशेष रूप से सब्जियों, फलदार वृक्षों और बागवानी फसलों के लिए अधिक प्रभावी साबित हो रही हैं, लेकिन अब इन्हें अनाज की खेती में भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। इन तकनीकों से न केवल पानी की बचत होती है, बल्कि उर्वरकों की दक्षता भी बढ़ती है और फसलों की गुणवत्ता में सुधार आता है।
राज्य सरकार की “मेरा पानी, मेरी विरासत”, “सूक्ष्म सिंचाई योजना”, और “प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना” जैसी पहलों ने किसानों को जल संरक्षण तकनीकों को अपनाने के लिए आर्थिक सहायता और प्रशिक्षण प्रदान किया है। इसके अतिरिक्त, जल उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए किसानों को खेतों का समतलीकरण (लेजर लेवलिंग) करने की भी सलाह दी जा रही है, जिससे सिंचाई जल का अधिकतम लाभ मिल सके। इस प्रकार, हरियाणा की सिंचाई प्रणाली परंपरा और तकनीक का समन्वय प्रस्तुत करती है, जहाँ नहरों और ट्यूबवेल की सहायता से बड़े पैमाने पर सिंचाई की जा रही है, वहीं जल संरक्षण के लिए आधुनिक विधियों को भी धीरे-धीरे अपनाया जा रहा है ताकि भविष्य में जल संकट से बचा जा सके और कृषि को टिकाऊ बनाया जा सके।
मशीनरी और कृषि उपकरण हरियाणा में कृषि यंत्रीकरण (Mechanization) ने पारंपरिक खेती के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है। पहले जहाँ खेती पूरी तरह मानव श्रम और पशुओं पर निर्भर थी, वहीं अब ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, सीड ड्रिल, थ्रेशर, रोटावेटर, मल्टीक्रॉप प्लांटर, स्ट्रॉ रीपर, बूम स्प्रेयर और लेज़र लेवलर जैसे आधुनिक कृषि यंत्रों ने खेती को अधिक तेज़, सटीक और लाभकारी बना दिया है। ट्रैक्टर अब हरियाणा के लगभग हर गाँव में दिखाई देते हैं। ये सिर्फ जुताई के लिए ही नहीं, बल्कि कई अन्य कार्यों जैसे बोआई, सिंचाई उपकरण खींचने, फसल ढोने और कृषि यंत्र चलाने में उपयोग किए जाते हैं। इससे खेतों की तैयारी का समय घटा है और काम की गुणवत्ता बढ़ी है। हार्वेस्टर मशीनों के उपयोग से कटाई का काम बेहद तेज़ और कुशल हो गया है, खासकर गेहूं और धान जैसी बड़ी फसलों की कटाई में। संयुक्त हार्वेस्टर मशीनें फसल काटने, गहाई करने और दाने अलग करने का काम एक ही प्रक्रिया में कर देती हैं, जिससे श्रम की आवश्यकता और समय—दोनों की बचत होती है। सीड ड्रिल और जीरो टिलेज मशीनें बीज बोने की प्रक्रिया को सरल और वैज्ञानिक बना चुकी हैं। इन मशीनों की सहायता से बीजों को एक समान गहराई पर, उचित दूरी पर बोया जाता है जिससे अंकुरण बेहतर होता है और पैदावार में वृद्धि होती है। ज़ीरो टिलेज मशीनें विशेष रूप से गेहूं की फसल के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं क्योंकि ये बिना जुताई किए ही बीज बो देती हैं, जिससे समय और ईंधन की बचत होती है।
थ्रेशर मशीनें गेहूं, चना, सरसों आदि की गहाई के लिए प्रयोग की जाती हैं। ये मशीनें तेजी से दानों को फसल से अलग कर देती हैं, जिससे किसान को समय पर अनाज प्राप्त हो जाता है और पोस्ट-हार्वेस्ट नुकसान कम होता है। लेज़र लैंड लेवलर (Laser Land Leveler) का भी तेजी से विस्तार हुआ है। यह यंत्र खेतों को समतल बनाता है जिससे पानी की बचत होती है, उर्वरकों का समान वितरण होता है और फसल की गुणवत्ता सुधरती है।
मशीनरी के उपयोग से फायदे: • श्रम लागत में भारी कमी आई है, खासकर मजदूरों की कमी वाले क्षेत्रों में। • खेती का समय घटा है जिससे एक साल में अधिक फसलें लेने की संभावना बढ़ी है। • उत्पादन में वृद्धि हुई है क्योंकि यंत्रों की मदद से खेती वैज्ञानिक तरीके से की जाती है। • मृदा संरक्षण, जल प्रबंधन और उर्वरकों की कुशलता में सुधार हुआ है।
सरकार की भूमिका भी यंत्रीकरण को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण रही है। हरियाणा सरकार किसानों को सब्सिडी पर कृषि यंत्र उपलब्ध करा रही है और कस्टम हायरिंग सेंटर (CHC) की स्थापना कर रही है जहाँ किसान किराये पर मशीनें ले सकते हैं। इसके अलावा, किसान प्रशिक्षण केंद्रों में आधुनिक यंत्रों के संचालन का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। इस प्रकार, हरियाणा में कृषि यंत्रों का बढ़ता उपयोग खेती को आधुनिक, लाभकारी और टिकाऊ बना रहा है, जिससे किसानों की आय में लगातार सुधार हो रहा है।
धान और गेहूं उत्पादन में चुनौतियाँ 1. जल संकट धान की खेती जल-सघन होती है, जिससे जल स्रोतों पर दबाव बढ़ता है। हरियाणा में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है, जो कृषि के लिए गंभीर खतरा है।
. मिट्टी की उपजाऊ शक्ति में कमी बार-बार एक जैसी फसल चक्र (धान-गेहूं) अपनाने से मिट्टी की उर्वरता घटती जा रही है, जिससे उत्पादन में गिरावट आ सकती है।
3. जलवायु परिवर्तन बढ़ता तापमान, अनियमित वर्षा और चरम मौसमी घटनाएं किसानों के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर रही हैं।
4. कृषि लागत और बाजार अस्थिरता बीज, उर्वरक और कीटनाशक जैसी इनपुट लागतों में बढ़ोतरी किसानों की आय को प्रभावित कर रही है। इसके अलावा, बाजार में दामों की अनिश्चितता और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की सीमाएं भी किसानों के लिए चिंता का विषय हैं।
सरकारी योजनाएं और सहायता • मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP): सरकार गेहूं और धान पर MSP प्रदान करती है, जिससे किसानों को न्यूनतम लाभ सुनिश्चित होता है।
• सिंचाई और जल संरक्षण योजनाएं: हरियाणा सरकार जल संरक्षण के लिए ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा दे रही है।
• कृषि बीमा योजना: फसल बीमा योजनाएं किसानों को प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान से बचाने में मदद करती हैं।
• कृषि अनुसंधान एवं प्रशिक्षण: किसानों को नई तकनीक, उन्नत बीज और बेहतर खेती के तरीकों से अवगत कराने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
धान और गेहूं उत्पादन का सामाजिक-आर्थिक प्रभाव कृषि हरियाणा की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। धान और गेहूं की खेती ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार प्रदान करती है। इससे न केवल किसान परिवारों की आय बढ़ती है, बल्कि संबंधित कृषि उद्योगों जैसे अनाज मिलिंग, खाद्य प्रसंस्करण आदि को भी प्रोत्साहन मिलता है। भविष्य की संभावनाएं और सुझाव • फसल विविधीकरण: अधिक पानी बचाने वाली फसलों की खेती को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। • सतत कृषि: जैविक खेती और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया जाना चाहिए। • तकनीकी समावेशन: स्मार्ट कृषि उपकरण और डिजिटल कृषि का प्रसार जरूरी है। • नवाचार: जल संरक्षण तकनीकों और उन्नत बीज किस्मों का विकास किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष हरियाणा ने अपनी परिश्रमशील कृषि व्यवस्था, उपजाऊ भूमि, सिंचाई के बेहतर साधनों और सरकार की सहयोगात्मक नीतियों के कारण धान और गेहूं उत्पादन में देश में अग्रणी स्थान प्राप्त किया है। हालांकि चुनौतियाँ भी हैं, लेकिन निरंतर सुधार और नवाचार के माध्यम से हरियाणा भारत के खाद्यान्न सुरक्षा के स्तंभ के रूप में अपनी भूमिका बनाए रखेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) 1. हरियाणा में धान और गेहूं की खेती किस मौसम में होती है? धान मुख्य रूप से खरीफ मौसम (जून से अक्टूबर) में और गेहूं रबी मौसम (नवंबर से अप्रैल) में उगाई जाती है। 2. हरियाणा में सबसे ज्यादा कौन-कौन से जिले धान और गेहूं के लिए प्रसिद्ध हैं? धान के लिए करनाल, कुरुक्षेत्र, यमुनानगर और गेहूं के लिए करनाल, हिसार, फतेहाबाद प्रमुख जिले हैं। 3. हरियाणा में धान की कौन-कौन सी किस्में उगाई जाती हैं? यहाँ बासमती जैसे 'PUSA 1121' और गैर-बासमती किस्में दोनों उगाई जाती हैं। 4. किसानों को सरकार से किस प्रकार की सहायता मिलती है? MSP, फसल बीमा, सिंचाई उपकरणों पर सब्सिडी, प्रशिक्षण आदि सहायता मिलती है। 5. हरियाणा में जल संरक्षण के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसिफिकेशन (SRI) जैसी तकनीकों को अपनाया जा रहा है।
Tags : Article | Agriculture | Farming | India
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