Direct Seeded Rice (DSR) एक आधुनिक विधि है जहाँ पर पारंपरिक रोपाई प्रणाली की जगह नर्सरी में तैयार करने और इसके बाद खेत में पौधों की रोपाई करने की अब कोई आवश्यकता नहीं है। इसकी जगह अब, धान के बीज को सीधे खेत में तैयार की गई मिट्टी में बो दिए जाता हैं। यह प्रणाली समय, श्रम और पानी की इन सब की बचत करने में सहयाता करता है। DSR विधि में सफलतापूर्वक खेती करने के लिए ऐसी मिट्टी की आवश्यकता होती है जिसमें अच्छी जलधारण क्षमता हो, जैसे चिकनी, मटियार या मटियार-दोमट मिट्टी। रेतीली मिट्टी अनुपयुक्त है क्योंकि उसमें पानी का रिसाव अधिक होता है। पोषक तत्व प्रबंधन के लिए, मिट्टी की जांच करवाकर कमी वाले पोषक तत्वों की भरपाई करनी चाहिए, जिसमें सामान्यतः नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और जिंक की उचित मात्रा शामिल है
Methods of Direct Seeding (प्रत्यक्ष बुवाई की विधियाँ)
1.सूखी प्रत्यक्ष बुवाई (Dry Direct Seeding)
- इसमें धान के बीज सीधे सूखी या हल्की नमी वाली मिट्टी में बोए जाते हैं।
- इसमें नर्सरी बनाने और पौधों की रोपाई करने की ज़रूरत नहीं होती।
- बीज बोने के लिए सीड ड्रिल मशीन, जीरो-टिल ड्रिल मशीन या ट्रैक्टर चलित बुवाई मशीन का इस्तेमाल किया जाता है।
- बोआई से पहले खेत को अच्छे से जोतना और समतल करना ज़रूरी है।
- बोआई से पहले खरपतवार रोकने के लिए हर्बीसाइड का छिड़काव किया जाता है।
- बीजों को सीधी कतारों में 20–25 सेंटीमीटर की दूरी पर बोया जाता है, ताकि पौधे आसानी से बढ़ सकें।
- इस विधि से पानी की खपत पारंपरिक खेती की तुलना में 30–35% कम हो जाती है।
- इसमें मजदूरों की ज़रूरत कम पड़ती है, जिससे लागत घटती है।
- यह विधि खासकर उन क्षेत्रों में उपयोगी है, जहाँ भूजल स्तर कम हो या पानी की कमी हो।
- इसमें सबसे बड़ी चुनौती खरपतवार की समस्या है।
- इसलिए समय पर हर्बीसाइड और उचित प्रबंधन करना ज़रूरी है।
अगर यह तकनीक को सही तरीके से अपनाई जाए तो यह विधि किसानों के लिए लाभदायक होगी और साथ ही पर्यावरण के लिए अनुकूल हो सकती है।
- Wet Direct Seeding (गीली प्रत्यक्ष बुवाई)
गीली प्रत्यक्ष बुवाई (Wet Direct Seeding) धान की खेती एक विधि है, जिसमें खेत को पहले हल्की सिंचाई करके या वर्षा जल से गीला कर कीचड़नुमा बनाया जाता है। फिर धान के अंकुरित बीजों को हाथ से या मशीन के द्वारा खेत में समान रूप से फैला दिया जाता है। बीज मिट्टी में दब जाते हैं और पर्याप्त नमी मिलने पर जल्दी अंकुरित हो जाते हैं। यह विधि विशेष रूप से बरसात के मौसम क्षेत्रों में ज्यादा आम है क्योंकि इसमें प्राकृतिक रूप से पर्याप्त नमी उपलब्ध रहती है। इस तरीके का फायदा यह है कि इसमें रोपाई की आवश्यकता नहीं होती, और इससे समय और श्रम की भी बचत होती है।
- Water seeding (पानी में प्रत्यक्ष बुवाई)
- इस विधि में धान के बीज सीधे पानी भरे हुए खेत में डाले जाते हैं।
- बीज या तो सीधे पानी में डाले जाते हैं या पहले उन्हें अंकुरित करके पानी में बोया जाता है।
- यह विधि उन क्षेत्रों में अधिक उपयोग होती है जहाँ पानी की उपलब्धता पर्याप्त हो।
- पानी भरे होने के कारण खरपतवार की समस्या कम होती है।
- इसमें श्रम और समय दोनों की बचत होती है, क्योंकि नर्सरी और रोपाई की ज़रूरत नहीं होती।
- बीज समान रूप से खेत में फैल जाते हैं और अंकुरित होकर जल्दी बढ़ने लगते हैं।
- यह पद्धति बरसात के मौसम या स्थायी सिंचाई वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है।
- हालांकि, इसमें अधिक पानी की आवश्यकता होती है, इसलिए यह सूखे या पानी की कमी वाले क्षेत्रों में सफल नहीं है।
- यदि बीज ठीक से तैयार न हों तो वह फसल ख़राब हो सकती है।
- यदि इस विधि को सही ढंग से अपनाने पर यह विधि किसानों के लिए आसान, कम खर्चीली और उपज बढ़ाने वाली साबित हो सकती है।
डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) विधि हेतु मिट्टी के पोषक तत्व प्रबंधन की सारणी
मुख्य पोषक तत्व (Macronutrients)
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पोषक तत्व
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महत्व
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अनुशंसित मात्रा (प्रति हेक्टेयर)
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स्रोत
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DSR में विशेष टिप्पणी
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नाइट्रोजन (N)
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पौधे की वृद्धि, टिलरिंग (कल्ले फूटना) और उपज के लिए जिम्मेदार।
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120 - 150 kg
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यूरिया, कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट (CAN)
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नाइट्रोजन को विभाजित करके दें (बुवाई पर, कल्ले फूटने के समय, बाली बनने से पहले)। नीम-कोटेड यूरिया का उपयोग दक्षता बढ़ाता है।
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फॉस्फोरस (P)
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जड़ों के विकास, पौधे की परिपक्वता और ऊर्जा संचरण के लिए आवश्यक।
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60 - 80 kg (P₂O₅ के रूप में)
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डाई-अमोनियम फॉस्फेट (DAP), सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP)
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अच्छा जड़ विकास DSR में सफलता की कुंजी है ताकि पौधा खरपतवारों से प्रतिस्पर्धा कर सके। इसे बुवाई से पहले आखिरी जुताई के समय डालें।
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पोटाश (K)
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बीमारियों से लड़ने की क्षमता, पानी का उपयोग और दानों की गुणवत्ता बढ़ाता है।
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40 - 60 kg (K₂O के रूप में)
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म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP), पोटेशियम नाइट्रेट
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मिट्टी की जाँच के आधार पर प्रयोग करें। पोटाश भी बुवाई के समय आधार रूप में दिया जा सकता है।
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सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients)
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पोषक तत्व
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महत्व
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कमी के लक्षण
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अनुशंसित उपाय (प्रति हेक्टेयर)
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DSR में विशेष टिप्पणी
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जिंक (Zn)
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कल्ले बनने, प्रोटीन संश्लेषण और वृद्धि हार्मोन के लिए जरूरी।
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पत्तियों पर भूरे-धूसर रंग के धब्बे, नई पत्तियों का सफेद होना।
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मृदा उपयोग: 20-25 kg जिंक सल्फेट बुवाई前 डालें। छिड़काव: 0.5% जिंक सल्फेट का घोल (5 ग्राम प्रति लीटर पानी) का छिड़काव।
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DSR में जिंक की कमी का खतरा अधिक होता है क्योंकि रोपाई के समय जड़ों को होने वाला झटका (root shock) नहीं होता, जो जिंक की उपलब्धता बढ़ाता है।
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आयरन (Fe)
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पर्णहरित (क्लोरोफिल) के निर्माण और श्वसन के लिए आवश्यक।
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नई पत्तियों का पीला पड़ना (शिराओं के बीच), जबकि शिराएं हरी रहती हैं।
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छिड़काव: 1% फेरस सल्फेट का घोल (10 ग्राम प्रति लीटर पानी) का 2-3 बार छिड़काव।
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हल्की दोमट मिट्टी में इसकी कमी होने की संभावना अधिक रहती है।
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महत्वपूर्ण नोट:
- उपरोक्त अनुशंसाएँ सामान्य हैं। वास्तविक खुराक और अनुपात मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही निर्धारित करना चाहिए।
- जैविक खाद (गोबर की खाद, कम्पोस्ट) का प्रयोग (8-10 टन/हेक्टेयर) मिट्टी की संरचना और पोषक तत्वों की उपलब्धता में सुधार करता है।
- DSR में खरपतवार प्रबंधन अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि खरपतवार पोषक तत्वों की प्रतिस्पर्धा करते हैं।
मिट्टी की उर्वरता को कैसे संरक्षित करें (Soil Conservation Practices for DSR)
DSR विधि न केवल पानी की बचत करता है, बल्कि उचित प्रबंधन से मिट्टी की सेहत को भी बेहतर बनाया जा सकता है।
- मिट्टी की जांच (Soil Testing):
- सबसे पहला और जरूरी कदम है मिट्टी की जांच करवाना। इससे पता चलेगा कि आपकी मिट्टी में किस पोषक तत्व की कमी या अधिकता है। उसी के आधार पर उर्वरकों का संतुलित प्रयोग करें।
- जैविक खाद का प्रयोग (Use of Organic Manures):
- कम्पोस्ट/गोबर की खाद: यह एक उपयोगी सुझाव है कि बुवाई से लगभग 3-4 सप्ताह पहले प्रति हेक्टेयर 8-10 टन अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद डालें, क्योंकि यह मिट्टी की संरचना में सुधार करती है, जल धारण क्षमता बढ़ाती है और मिट्टी के सूक्ष्मजीवों की गतिविधि को बढ़ाती है, जिससे पौधों के लिए पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है
- हरी खाद: धान की फसल से पहले ढैंचा या सनई जैसी हरी खाद वाली फसलें उगाना मिट्टी की उर्वरता और नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाने का एक प्रभावी तरीका है. इन फलीदार पौधों की जड़ें वातावरण से नाइट्रोजन को मिट्टी में बांधती हैं, जिससे अगली फसल के लिए प्राकृतिक रूप से पोषक तत्वों की पूर्ति होती है और रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होती है. इससे मिट्टी की संरचना में सुधार होता है, कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है और समग्र रूप से उपज में भी वृद्धि देखी जा सकती है.
- फसल चक्र (Crop Rotation):
- लगातार धान-धान की फसल लेने से मिट्टी की सेहत खराब होती है। DSR के बाद दलहनी फसलें जैसे चना, मसूर, मटर आदि लगाएं। ये फसलें वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करके उसकी उर्वरता और भी बढ़ा देती हैं।
- संतुलित रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग (Balanced Chemical Fertilization):
- मिट्टी जांच के आधार पर ही NPK और सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग करें। अंधाधुंध यूरिया का प्रयोग करने से बचें।
- नीम-कोटेड यूरिया का प्रयोग करें। क्युकी यह नाइट्रोजन को धीरे-धीरे छोड़ता है, जिससे पौधे इसे बेहतर तरीके से उपयोग कर लेते हैं और नाइट्रोजन की बर्बादी कम होती है।
- खरपतवार प्रबंधन (Weed Management):
- DSR में खरपतवार एक बड़ी चुनौती है। खरपतवार पोषक तत्वों और पानी के लिए मुख्य फसल से प्रतिस्पर्धा करते हैं।
- फसल की शुरुआत मेंबुवाई के 2-3 दिन के अंदर और फिर 20-30 दिन बाद खरपतवारनाशी का प्रयोग करें, और इसके बाद हाथ से निराई-गुड़ाई करके खरपतवारों को नियंत्रित करें। इससे खरपतवार फसल के पोषक तत्वों को नहीं ले पाते और फसल को पर्याप्त पोषण मिलता रहता है।
- जल प्रबंधन (Water Management)
- DSR की सबसे बड़ी खूबी ये है की यह पानी की बचत की बचता करता है और पारंपरिक विधि में हमेशा पानी भरा रहता है, जिससे मिट्टी में ज़हरीले तत्व बनते हैं जैसे Iron Sulphide जिससे जड़ें सड़ने लगती हैं।
- DSR में Alternate Wetting and Drying (AWD) तकनीक अपनाएं। यानी खेत में लगातार पानी न भरकर, उसे कुछ समय के लिए सूखने दें और फिर पानी दें। इससे मिट्टी में हवा का संचार बेहतर होगा और जड़ें स्वस्थ रहेगी और जिससे पोषक तत्वों का अवशोषण आसान हो जायेगा ।
- मल्चिंग खेती (Mulching Farming )
- फसल अवशेषों को खेत में मल्च (पलवार) के रूप में छोड़ना एक स्थायी कृषि पद्धती है, जिसमें अवशेषों की परत मिट्टी की नमी बनाए रखती है,
- मिट्टी के तापमान को नियंत्रित करती है, और समय के साथ सड़कर जैविक खाद में बदलकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है।
- यह मल्चिंग खरपतवारों को भी रोकता है, मिट्टी के कटाव को कम करता है और पौधों की जड़ों को पोषण प्रदान करता है।
निष्कर्ष:
DSR विधि एक टिकाऊ और लाभकारी पद्धति है। इसमें मिट्टी के पोषक तत्वों का संतुलित और विज्ञान-आधारित प्रबंधन सफलता की कुंजी है। मिट्टी जांच, जैविक खाद का प्रयोग, फसल चक्र और कुशल जल प्रबंधन के जरिए न केवल अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है, बल्कि मिट्टी की दीर्घकालिक उर्वरता को भी संरक्षित किया जा सकता है।
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