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सिमरी में उपेक्षा के दौर से गुजर रहा हस्तकरघा उद्योग

जिस चरखे को चला राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देश में स्वदेशी आंदोलन का बिगुल फूंका था। वही चरखा व इससे संचालित हस्तकरघा उद्योग बिहार के बक्सर जिले के सिमरी प्रखंड में अंतिम सांसें गिन रहा है।

fasalkranti.in
समाचार, 27 Jul, 2021

जिस चरखे को चला राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देश में स्वदेशी आंदोलन का बिगुल फूंका था। वही चरखा व इससे संचालित हस्तकरघा उद्योग बिहार के बक्सर जिले के सिमरी प्रखंड में अंतिम सांसें गिन रहा है। व्यवसाय से जुडे बुनकरों की स्थिति अत्यंत दयनीय है और दिनभर की कडी मेहनत के बाद भी इन्हें दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना मुश्किल हो रहा है। दरअसल, समय के साथ हस्तकरघा उद्योग में तकनीकी बदलाव के लिए सरकारी मदद नहीं मिलने से यह स्थिति उत्पन्न हुई है।अब चरखे पर सूत काट इसे चादर, कंबल और दरी का शक्ल देने वाले बुनकरों के कद्रदान भी नहीं बचे हैं। लिहाजा घंटों की कडी मेहनत के बाद तैयार हुए कंबल व चादर जैसे गर्म कपडों को औने-पौने दामों में बेचना इनकी मजबूरी है। हालांकि, पिछले साल जिला पदाधिकारी राघवेंद्र सिंह द्वारा धनहा गांव में संचालित हस्तकरघा उद्योग का जायजा लिया गया था। 

इस दौरान उन्होंने बुनकरों के द्वारा कडी मेहनत करके तैयार किए जा रहे कंबल निर्माण कार्य को देख न सिर्फ इसे कुटीर उद्योग का दर्जा दिलाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर प्रयास करने का आश्वासन दिया था बल्कि तैयार किए गए कंबल की खरीदारी करने हेतु अधिकारियों को निर्देशित किया था। डीएम के आदेश के आलोक में 538 कंबलों की खरीदारी भी हुई। मगर उसके बाद किसी ने बुनकरों की सुध नहीं ली। प्रखंड मुख्यालय से करीब सात किमी दूर मझवारी पंचायत के धनहां गांव में आज भी गडेरियों के 15-20 कुनबे इस परंपरागत व्यवसाय से जुडे हुए हैं। वे लोग खुद ही भेड पालते हैं और उनके बाल उतार उसकी धुनाई कर गांव में ही चरखे से सूत तैयार करते हैं। उसी सूत से हस्त संचालित करघे के जरिए चादर व कंबल तैयार किये जाते हैं। हालांकि, गांव में गडेरिये के करीब साठ परिवार हैं। लेकिन, दो तिहाई परिवार अपने पुश्तैनी धंधे से मुंह मोड कर रोजी-रोटी के लिए अन्य प्रदेशों की ओर रुख कर चुके हैं। 

हस्तकरघा उद्योग से जुडे विमल पाल ने बताया कि पालतू भेडों के बाल को कतर इसकी धुनाई कराई जाती है। धुने हुए बाल को चरखों की सहायता से सूत बनाया जाता है। जिसे सुखाने के बाद हाथ से चलाए जाने वाले चरखे की सहायता से गर्म वस्त्न बनाए जाते हैं। उन्होंने बताया कि एक चादर बनाने में करीब एक से डेढ़ घंटे का समय लगता है। जबकि, कंबल बनाने में तीन से चार घंटे लग जाते हैं। इसके बाद तैयार चादर 200 रुपये में व कंबल 400 से 600 रुपये तक में बिकता है। मूल्य के हिसाब से तो मजदूरी का खर्च भी नहीं मिल पाता है। जबकि, भेडों को पालने व उनके चारा का प्रबंध करने से लेकर माल तैयार करने में भी पूंजी लगती है। 

हस्तकरघा से जुडे बुनकर अपनी माली हालत के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं। स्थानीय गांव के दीनदयाल पाल ने बताया कि कुछ दशक पूर्व उनके द्वारा बनाए गए कंबल को सीधे सरकार खरीदती थी। तब गांवों में खाद व ग्रामोद्योग समितियां हुआ करती थीं। जिन्हें कंबल बनाने का आर्डर मिलता था। उन्हीं के बनाए कंबल बिहार पुलिस व होमगार्ड के जवानों को ठंड से बचने के लिए दिए जाते थे। भेड के बाल से निर्मित ये कंबल अन्य कंबलों की तुलना में अधिक गर्मी भी प्रदान करते हैं। मगर नब्बे के दशक से सरकारी सोच में आए बदलाव के चलते आर्डर मिलना बंद हो गया। हस्तकरघा उद्योग से जुडे बुनकरों को अब भी सरकार से आस बनी हुई है। 

मोहन जी पाल ने कहा कि सरकार द्वारा भेड़ के बाल से बने कंबल नहीं खरीदने से उन लोगों का परंपरागत व्यवसाय बिखर गया है। कभी न कभी सरकार का ध्यान उन पर जरूर होगा और फिर पुराने दिन लौटेंगे। वहीं, बासगीत पाल कहते हैं कि उन लोगों की इतनी पहुंच भी नहीं है कि हस्तकरघा उद्योग के नाम पर लगी प्रदर्शनी में अपने उत्पाद को ले जा सकें। हालांकि, व्यापारी उन्हीं के उत्पाद को खरीद कर बाहर बेहतर कीमत पर बेचते हैं। प्लसमुनी पाल ने कहा कि सरकारी उदासीनता के चलते अब उनके घरों के बच्चे अब चरखे पर सूत कातने के बजाए मजदूरी करना बेहतर समझते हैं। हरिनारायण पाल ने कहा कि अब खेत भी सीमति हो रहे हैं। लिहाजा, भेडों को पालना पहले जैसा आसान नहीं रह गया है।

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