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भोजपुर की ग्लेज्ड टाइल्स फैक्ट्री औद्योगिक विसंगतियों का हुआ शिकार

एकीकृत बिहार यानी जब झारखंड अलग नहीं हुआ था, तब बिहार की पहचान खनिज संपदा से भरपूर एक औद्योगिक राज्य के रूप में थी। झारखंड क्षेत्न से बाहर डुमरांव और डालिमया नगर आदि औद्योगिक नगर कहलाते थे।

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समाचार, 21 Jul, 2021, (अपडेटेड 21 Jul, 2021 07:44PM)

एकीकृत बिहार यानी जब झारखंड अलग नहीं हुआ था, तब बिहार की पहचान खनिज संपदा से भरपूर एक औद्योगिक राज्य के रूप में थी। झारखंड क्षेत्न से बाहर डुमरांव और डालिमया नगर आदि औद्योगिक नगर कहलाते थे। हालांकि, राजनैतिक अस्थिरता और बुनियादी क्षेत्न में जरूरत के मुताबिक काम नहीं होने से उद्योग सिमटते गए। भोजपुर का ग्लेज्ड टाइल्स फैक्ट्री इसी औद्योगिक विसंगतियों का शिकार हुआ। रातों रात राज्य में हुए सत्ता परिवर्तन ने इस फैक्ट्री को हमेशा के लिए बंद उद्योग की श्रेणी में ला दिया। 1980 से 90 के बीच केंद्र सरकार में ताकतवर चेहरा रहे बक्सर के सांसद के के तिवारी की पहल पर तीन करोड की लागत से ग्लेज्ड टाइल फैक्ट्री तो लग गई लेकिन उससे एक दिन भी उत्पादन शुरू नहीं हुआ। बाद में यह फैक्ट्री केवल राजनीतिक शिगूफा साबित हुई और मशीनें जंग खाकर चोरों का निवाला बनती गईं। 

डुमरांव नगर परिषद के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष नागेन्द्र नाथ तिवारी बताते हैं कि डुमरांव राज ने क्षेत्न में उद्योग को बढ़ावा देने की नीयत से उद्योगपति बबुना जी परिवार को करीब 20 बीघा जमीन मुहैया करायी। उस जमीन पर 1980 में सुप्रभात स्टील फैक्ट्री खुली। उत्पादन कार्य भी आरंभ हुआ लेकिन, बिजली व परिवहन जैसी लचर बुनियादी सुविधाओं का विस्तार न होने के कारण उक्त फैक्ट्री ने महज सात साल में दम तोड दिया। सरकारी उपक्रम ग्लेज्ड टाइल्स फैक्ट्री बिना उत्पादन के बंद हो गया। 

नए भोजपुर में केंद्र सरकार में तत्कालीन उद्योग मंत्नी रहे के.के.तिवारी की पहल पर 1988 में सरकारी उपक्रम ग्लेज्ड टाइल्स फैक्ट्री की नींव रखी गयी। तत्कालीन मुख्यमंत्नी बिदेश्वरी दूबे ने इस फैक्ट्री का शिलान्यास किया और इसे शाहाबाद के औद्योगिक विकास के लिए मील का पत्थर बताया। इस मिल के परिचालन के लिए 22 मजदूरों के स्थाई नियुक्ति कर दी गई थी। जो मिल परिचालन की उम्मीद में लंबे समय तक घर बैठे वेतन पाते रहे। बाद में उन्हें उद्योग विभाग ने दूसरी जगहों पर तबादला कर दिया। प्रो. के.के.तिवारी के पहल पर एमपी हाई स्कूल बक्सर में शिविर लगाकर मजदूरों की बहाली की गई थी। 

एक पुराने मजदूर नेता बताते हैं कि जबतक फैक्ट्री बनकर पूरी हुई, तब तक सूबे में सत्ता परिवर्तन हो गया और कांग्रेस की सरकार चली गई। बाद में नई सरकार ने फैक्ट्री में उत्पादन शुरू करने को लेकर कोई रुचि नहीं ली और एक दिन भी इससे उत्पादन नहीं हुआ। बाद में फैक्ट्री में लगीं करोडों रुपये की मशीनें चोरी हो गईं। फैक्ट्री के अवशेष आज भी मौजूद हैं। हालांकि, बंद होने की वजह केवल राजनीतिक नहीं रही। जानकार बताते हैं कि तब औद्योगिक विकास के अनुरूप बिजली और बुनियादी ढांचों का विकास नहीं हो सका। सियासी इच्छा शक्ति का भी अभाव रहा, जिसके कारण बन कर तैयार नई-नवेली फैक्ट्री बिना उत्पादन किए ही खत्म हो गई।

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