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पोषक तत्वों का खजाना है मोटा अनाज

बिहार के कोसी को तटबंध के बीच बांधे जाने से पहले यह इलाका कभी मोटी फसलों का बड़ा उत्पादक होता था। मोटी फसल के बारे में कृषि विज्ञान केंद्र राघोपुर के कृषि विज्ञानी डा. मनोज कुमार बताते हैं कि 

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समाचार, 06 Sep, 2021, (अपडेटेड 06 Sep, 2021 06:50PM)

बिहार के कोसी को तटबंध के बीच बांधे जाने से पहले यह इलाका कभी मोटी फसलों का बड़ा उत्पादक होता था। मोटी फसल के बारे में कृषि विज्ञान केंद्र राघोपुर के कृषि विज्ञानी डा. मनोज कुमार बताते हैं कि मोटी फसल पोषक तत्वों से भरपूर होती है। रासायनिक उर्वरक की जरूरत कम पड़ती है। इसकी उपज भी अधिक होती है। इनमें औषधीय गुण होने के कारण ये मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है। इन फसलों के अवशेष पशुओं के लिए पौष्टिक होते हैं। 

त्रिवेणीगंज प्रखंड के बाजितपुर निवासी किसान शैलेंद्र मोहन सिंह, मरौना के मनोज यादव, कटैया के परमेश्वरी मंडल आदि बताते हैं कि कोसी की मिट्टी और जलवायु मोटी फसल के लिए उपयुक्त थी। ऐसी फसलों की यहां बंपर पैदावार होती थी। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण था कि पहले कोसी उन्मुक्त बहती थी। जलजमाव वाले क्षेत्न अधिक थे। मोटी धान की फसल के अच्छे उत्पादन के लिए अधिक पानी की आवश्यकता होती है। इसलिए यह खेती समय की मांग भी थी और किसानों की जरूरत भी। 

जब तटबंध का निर्माण हुआ तो यह इलाका कोसी कमांड इलाका बन गया। नहरों से सिंचाई होने लगी तो खेती के तौर तरीके बदल गए, फसलें बदल गईं। अधिक उत्पादन और अच्छी कीमत के लिए मोटी फसलें यहां से धीरे-धीरे विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई। स्थिति यह है कि पारंपरिक धान की किस्मों के नाम तो नई पीढ़ी के लोग जानते तक नहीं हैं।  धान, ज्वार, बाजरा, चीन, मड़ुआ आदि यहां की मुख्य फसल हुआ करती थी। तटबंध बनाए जाने के बाद इस इलाके में नहरों का जाल बिछाया गया तो खेती के तौर-तरीके बदल गए। 

मानसूनी बारिश पर किसानों की निर्भरता घटने और सिंचाई का अच्छा साधन नहर के रूप में उपलब्ध होने के बाद किसान अपनी पसंद के अनुरूप खेती करने लगे। इससे कई फसल विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई। विलुप्त हो चुकी मोटी फसलों को बचाने में कृषि विभाग जुटा हुआ है। इसके लिए सरकार द्वारा जिले को 600 एकड़ का लक्ष्य तय कर किसानों को धान के बीज अनुदानित दर पर दिए गए। विभाग का मानना है निर्धारित लक्ष्य से अधिक खेती हुई है।

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