loader

सरकार के अनुदान से बदली सूरत, कई राज्यों में होती है वस्त्नों की सप्लाई

बिहार के गया जिले के मानपुर की पटवाटोली उद्योग नगरी के रूप में प्रसिद्ध् है।पटवा टोली में विभिन्न तरह के वस्त्न बनाने के लिए पहले सदा धागा आता था। प्लेन मशीन पर सदा गमछा एवं सदा थान

fasalkranti.in
समाचार, 19 Oct, 2021, (अपडेटेड 19 Oct, 2021 04:40PM)

बिहार के गया जिले के मानपुर की पटवाटोली उद्योग नगरी के रूप में प्रसिद्ध् है।पटवा टोली में विभिन्न तरह के वस्त्न बनाने के लिए पहले सदा धागा आता था। प्लेन मशीन पर सदा गमछा एवं सदा थान तैयार होते थे। जिसका उत्पादन और बिक्री कम होती थी। बुनकरों की आमदनी काफी कम होती थी। तब वस्त्न उद्योग के प्रति बुनकरों का ध्यान कम होने लगा। वे इस धंधे को छोड़ने लगे। अब सरकार ने बुनकरों को अनुदान दिया। उससे पावर लूम खरीदा गया। जिससे यहां की सूरत और सीरत दोनों बदल गई। उत्पादन और बिक्री  बढ़ने से बुनकरों की तकदीर भी बदल गई।   

पंजाब के धागे से गया में वस्त्रो का निर्माण होता है। प्रतिदिन दो ट्रक धागा पंजाब एवं तमिलनाडु से मंगाया जाता है। रंगीन गमछा, रजाई, तोशक के खोल का कपड़ा तैयार होता है। इसकी बिक्री बिहार के अलावा झारखंड्, असम, बंगाल में होती है। पटवा टोली से प्रतिदिन एक ट्रक गमछा बंगाल भेजा जाता है। इसके अलावा भी कई जगहों पर गमछा, रजाई, तोशक के खोल के कपड़े की थान भेजी जाती है। श्रीदुर्गाजी पटवाय जाति। सुधार समिति के पूर्व सभापति जितेन्द्र पटवा, पूर्व सलाहकार बंगाली पटवा का कहना है। दिन में बच्चे पावरलूम में काम करते हैं, रात में खुद पढ़ाई करते हैं। पिछले एक दशक से ज्यादा पटवाटोली ने आइआइिटयन दिए हैं।  लेकिन यहां से केवल अच्छे कपड़े ही नहीं बल्कि होनहार भी निकलते हैं। देश की कठिनतम परीक्षाओं में सफल होकर यहां के छात्नों ने इस पटवा टोली की पहचान अब होनहारों की टोली के रूप में बनानी शुरू कर दी है। 

कोई ऐसा वर्ष नहीं है, जब जेईई के मेन और एडवांस की परीक्षा में यहां छात्न सफल नहीं होते। इनका एक अलग जलवा है। पढ़ाई के साथ-साथ माता-पिता को पावरलूम में मदद भी करते हैं। यहां 10 दशक पूर्व की अपेक्षा उद्योग नगरी पटवा टोली में काफी बदलाव आया। बिहार ही नहीं दूसरे प्रदेश के लोगों के पसंद लायक वस्त्न यहां बनने लगे।  कम कीमत में बेहतरीन डिजाइन मिलने के वजह बंगाल में काफी मांग होने लगी। इससे उत्पादन बढ़ गया। बुनकर मजदूर को भी रोजगार मिलना शुरू हो गया। आज पटवा टोली में सरकार से निबंधित 882 पावर लूम इकाई है। उक्त इकाई में करीब नौ हजार पावर लूम संचालित है। ट्रक से उतार कर धागा को गोदाम तक लाने , ताना-बाना करने से लेकर लूम पर विभिन्न तरह के वस्त्न बनाने , सरियाने, वस्त्न को ठेला से गोदाम तक पहुंचाने एवं दूसरे प्रदेश में भेजने के लिए ट्रक पर लोड करने से करीब 45 हजार बुनकर मजदूर लगे हैं।

सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें

समाचार से और खबरें

ताज़ा ख़बरें

पाठकों की पसंद