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जैविक खेती को अपनाकर अधिक उत्पादन ले रहे हैं कई किसान

बिहार के पश्चिम चंपारण् जिला में जैविक खेती को अपनाकर नरिकटयागंज के दीपेन्द्र दुबे स्थायी अन्न उत्पादन का संदेश दे रहे हैं। प्रगतिशील किसान दुबे अपने यहां 55 देसी गायों को पाल रखा है। इन पशुओं के मल मूत्न से तैयार जैविक खाद को खेती में इस्तेमाल कर रहे हैं। बहरहाल वे पारंपरिक फसलों धान, गेहूं, मक्का, अरहर, मूंग आदी की खेती कर रहे हैं लेकिन खेती में वे मिट्टी की उर्वरा शिक्त को बनाए रखने के लिए विभिन्न फसल चक्रों का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका कहना है कि जैविक खेती स्थायी अन्न उत्पादन का माध्यम है, इससे मृदा उत्पादकता में किसी तरह की गिरावट नहीं आएगी बल्कि इसकी उर्वरा शिक्त पहले की तुलना में ज्यादा होगी।
बैंगलुरू से आईटी में स्नातक तथा इंदौर से व्यवसाय प्रबंधन में मास्टर डिग्री प्राप्त श्री दुबे के अनुसार रासायनिक उर्वरकों के अधिक इस्तेमाल से आज हरियाणा एवं पंजाब की कई जगहों पर मिट्टी के खेती के स्तर के नीचे कड़ी मिट्टी (पैन का निर्माण) हो गया है। यानी फसलों की जड़े उसके नीचे नहीं जा पा रही हैं। इससे कृषि उत्पादकता पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। इसके कारण आने वाले दिनों में अनाज उत्पादन में गिरावट आ सकती है। इससे बचने का एक मात्न उपाय जैविक खेती ही है।

उनके इस संदेश से प्रभावित होकर एक दर्जन किसानों ने जैविक खेती को अपनाकर खेती की शुरुआत कर दी है। वे बताते हैं कि किसानों का यह सोच कि रासायनिक खादों के इस्तेमाल से अधिक उत्पादन होता है और जैविक से नहीं यह भ्रामक है। जैविक खेती करने के तीसरे वर्ष से उत्पादन में रासायनिक खादों की तुलना में बढ़ोत्तरी हो जाएगी। इसको लेकर गोसंवर्ध्न को जैविक का आधार बताते हुए इसे अधिक से अधिक बढ़ावा देने को भी संदेश दे रहे हैं। उनके द्वारा की जा रही जैविक खेती को अपनाकर क्षेत्न के एक दर्जन से अधिक किसान इसका लाभ ले रहे हैं। 

इसमें शिकारपुर के अमति राव, पुरैनिया हरसरी के अमति दूबे, पुरैनिया के ददन मिश्र, गौनाहा परसा के आनंद तिवारी आदि का कहना है कि जैविक खेती को अपना कर न सिर्फ अधिक उत्पादन ले रहे हैं बल्कि स्वस्थ्य एवं खुशहाल जीवन शैली की बुनियाद की शुरुआत भी की है। ईख अनुसंधान केन्द्र, राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा सह नोडल पदाधिकारी क्षेत्नीय कृषि अनुसंधान केन्द्र, माधोपुर के  वैज्ञानिक डा. अजित कुमार का कहना है कि  कृषि के क्षेत्न में उत्पादन एवं मिट्टी उर्वरा शक्ति को बनाए रखने में जैविक खेती की कोई सानी नहीं है। आज के परिप्रेक्ष्य में किसानों को जैविक खेती पर ज्यादा जोर देने की जरूरत है तभी मिट्टी उर्वरा बरक़रार रह सकती है।

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